भूमिका
नववर्ष का आगमन केवल तिथि परिवर्तन नहीं, बल्कि आशा, नवचेतना और नवसृजन का उत्सव होता है। इसी भावभूमि पर प्रतिष्ठित वरिष्ठ रचनाकार आदरणीया प्रमिला त्रिवेदी जी की कविता ‘आगमन’ हमें नए दौर के उन स्वप्नों से परिचित कराती है, जहाँ मनुष्यता, प्रेम, सदाचार और समरसता जीवन के केंद्र में हों। यह कविता महँगाई, वैमनस्य और ऊँच-नीच से मुक्त एक ऐसे समाज की कल्पना करती है, जिसमें हर आँगन में खुशियाँ हों, हर मन में प्रीत हो और हर शब्द अमृत बनकर बरसे। नववर्ष की दहलीज़ पर खड़ी यह रचना पाठक को आत्ममंथन के साथ-साथ सकारात्मक संकल्पों की ओर प्रेरित करती है—मानो पतझड़ के बाद नवबसंत के आगमन की कोमल, आश्वस्त करती घोषणा हो।
आगमन

नए दौर में नवसृजन में
गीत लिखे कुछ ऐसे,
महँगाई हो जाए खत्म और
नव प्रभात हो जैसे।
सबसे हिल-मिल रहे जगत में,
कोई न रूठे किसी से,
पतझड़ निकल जाए जीवन का,
फिर बसंत हो जैसे।
खुशियाँ हों हर घर-आँगन में,
प्रीत-प्यार हो मन में,
सदाचार रहे जीवन में,
ऊँच-नीच न हो मन में।
धर्म एक हो मानवता का,
ज्ञान-ध्यान रहे मन में,
शब्द-शब्द अमृत बरसे,
मिठास रहे जीवन में।
हर आँगन में खुशियाँ बरसें,
प्रेम-प्यार हो मन में,
श्रद्धा-भाव रहे पूजा में,
धैर्य-ध्यान-चिंतन में।
नए दौर और नव वर्ष में
गीत लिखे कुछ ऐसे,
हर शाखा नव पत्र-पुष्प हो,
नव बसंत हो जैसे।
रचनाकार
✍️प्रमिला त्रिवेदी✍️
पाठ्य उन्नयन और विस्तार तथा चित्र सृजन

प्रस्तुति


