शिक्षक की नसीहत
प्रिय नवयुवको एवं नवयुवतियो,
तुम अपने बीच में जो प्रेम रूपी रिश्ता बनाते हो, यह विषम लिंगी के प्रति भावुक आकर्षण और लैंगिक संबंध बनाने की व्याकुलता को शांत करने का तरीका है।
यदि इस प्रेम को प्राकृतिक एवं जैविक अवधारणा की दृष्टि से देखा जाए तो… यह ना तो गलत है और ना ही कोई अपवित्र कृत्य है। यह समस्त प्राणी जगत के नर-मादाओं में व्याप्त है। परंतु प्राकृतिक एवं जैविक अवधारणा के अतिरिक्त मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जिसने जीवन को सरल एवं सुगम बनाने के लिए समाज नामक अवधारणा का निर्माण किया है। यह समाज मानव के अति व्यक्तिवादी व्यवहार को नियंत्रित करता है।
यदि मैं भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में बात करूं… विशेष कर देहाती क्षेत्र में, समाज नवयुवकों एवं नवयुवतियों को ऐसे प्रेम रूपी रिश्ते की स्वीकृति नहीं देता।
अब बात समझने की यह है कि एक ओर आप लोगों की जैविक व्याकुलता…. दूसरी ओर सामाजिक समझौतों का नियंत्रण। इन दोनों के टकराव से उत्पन्न होती है विघटनकारी अपराधिक घटनाएं। जिनमें हत्याएं तक हो जाती हैं।
नर और मादा के बीच लैंगिक संबंध… मादा के लिए यौन सुख से बढ़कर कहीं अधिक कष्टकारी एवं जिम्मेदारी भरा है। पुरुष प्रधान समाज होने के कारण संबंधों की अपवित्रता का एक बड़ा दोष नवयुवतियों के सिर मढ दिया जाता है।
जबकि प्राकृतिक एवं स्वभाविक रूप से नवयुवतियां लैंगिक संबंधों की व्याकुलता को शांत करने के लिए पहल नहीं करती। इस प्रेम रूपी रिश्ते की पहल सदैव नवयुवकों की ओर से होती है। मादा की अपेक्षा नर की व्याकुलता आक्रमक होती है। नवयुवतियां तो यूं ही घृणा शिकार होती आ रही हैं।
नवयुवतियो!! मैं भी तुम्हें सलाह अवश्य दूंगा। तुम अपनी व्याकुलता एवं सामाजिक समझौते के बीच सामंजस्य बनाना सीखो।
अति भावुक नवयुवकों को अपने मन मे स्थान मत दो।
नौका का प्रयोग नदी तैरने के लिए किया जाता है। नदी पार करके उसे सिर पर नहीं ढोया जाता।
अपने निर्णय की शक्ति को सुदृढ बनाओ। भावनाओं में बह जाना बहुत बड़ी विपदा खड़ी कर सकती है। प्रेम रूपी रिश्ते में नर को केवल नर समझो। वह तुम्हारे परिवार के सदस्यों से बढ़कर नहीं है।
सृजक

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति



