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ख़ामोशी के इस मंजर में!
संवाद कहाँ रह गए भंग!!
मस्तिष्क कपाट के बंजर में!
आ रहा ना कोई भी रंग!!
देख समूह की ख़ामोशी में!
‘खटाना’ हो रहा देख दंग!!
भौतिकता की इस भागमभाग में!
कलम में सबकी लग रहा जंग!!
कुछ तो बात बतियाओ प्यारी प्यारो!
संवाद को कुछ बढ़ाओ यारो!!
चिंतन मंथन यतन कर सबे उबारो!
बिन लड़े क्यों क्यों सब सब हारो!!
मरे हुए में जीवन जिजीवषा डारो!
आनंद ऐश्वरय उमंग तरंग उभारो!🌹!
स्रोत
धर्मेंद्र खटाना ‘धम्मू’
प्रस्तुति



