इच्छाएं क्यों खत्म नहीं होतीं?
कहते हैं कि इच्छाओं का कोई अंत नही है,
एक पूरी हुई तो दूसरी इच्छा जाग्रत होती है,
इसीलिए हमारे सनातन धर्म में और संतों ने कहा है कि
अपनी इच्छाओं को नियत्रंण में रखो।
क्योंकि इनका कोई अंत नहीं है।
इच्छा किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थिति या अनुभव को पाने की एक तीव्र चाहत या लालसा है, जो मन की स्वाभाविक स्थिति है और हमें प्रेरित करती है, यह एक मजबूत भावना है जो हमें लक्ष्य की ओर ले जाती है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह ही दु:ख का कारण भी बन सकती है क्योंकि यह अंतहीन होती है और मन को अशांत रखती है, जिसे कामना भी कहते हैं। किसी चीज़ को प्राप्त करने या किसी स्थिति में होने की गहरी चाहत या अभिलाषा करना ही इच्छा है।
यह एक मानसिक और भावनात्मक अवस्था है जो हमें किसी ना किसी चीज़ की ओर आकर्षित करती है। इसी को चाहत, लालसा, कामना, अभिलाषा, मनोकामना भी कहते हैं।
इच्छाएं हमें लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती हैं, जैसे कड़ी मेहनत करने के लिए।
आध्यात्मिक रूप से, इच्छाओं को दु:ख का कारण माना जाता है, खासकर जब वे आवश्यकताओं से अलग हो जाती हैं।
इच्छाओं का स्रोत मन है, जो लगातार नई इच्छाएं पैदा करता रहता है, फ़लतः व्यक्ति इच्छाओं के जाल में फंसा रहता है।
इच्छा वह आंतरिक खिंचाव या चाहत है जो हमें किसी चीज़ की ओर ले जाती है, जो हमारे जीवन को दिशा देती है, लेकिन अनियंत्रित होने पर यह हमें अशांत भी करती है, क्योंकि इच्छाहीन या निष्काम तो कोई हो नहीं सकता है। अब आता है सवाल कि इनको कम कैसे किया जाए? यदि आप आवश्यकताओं को कामनाओं से अलग कर सकते हैं तो इच्छाएं अपने-आप ही नियंत्रित हो जाती हैं।
इच्छा क्या है?
इच्छा का मतलब है किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थिति या अनुभव को पाने की तीव्र चाह या आकांक्षा। यह एक मजबूत भावना है जो किसी व्यक्ति को किसी चीज को प्राप्त करने या प्राप्त करने की
इच्छा होना।
इच्छाएं हमारी प्राथमिकताओं को निर्देशित करती हैं, प्राथमिकताएं हमारे विकल्पों को आकार देती हैं, और विकल्प हमारे कार्यों को निर्धारित करते हैं। जिन इच्छाओं की सीमा नही होती, वह अपराध को भी जन्म देती हैं।
इच्छा का मतलब किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिणाम की चाहत है तो इच्छा, चाहत, लालसा, लोभ का अर्थ है लालसा का विवरण होना।
इच्छा भावना की ताकत पर जोर देती है और अक्सर मजबूत इरादे या उद्देश्य को दर्शाती है। इच्छा कभी-कभी मज़बूत तो कभी-कभी कमजोरी भी बन जाती है।
इच्छा मन की वह स्वाभाविक स्थिति है जिसमें व्यक्ति किसी वस्तु, अनुभव या स्थिति की ओर आकर्षित होता है और उसे प्राप्त करने की चाह रखता है।
हमारी इच्छा हमें आशा देती है। हमारी इच्छा हमें प्रेरणा और ऊर्जा देती है। कोई इच्छा अपने आप नहीं पैदा होती। हमें उसे ढूँढ़ना होता है, और फिर उसे पोषित करना पड़ता है।
फिर भी इच्छाएं सीमित होनी चाहिए।
रचनाकार

प्रमिला त्रिवेदी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति




