‘सरस’ की सरल लेखनी
प्रस्तुतकर्ता

‘सरस’ की सरल लेखनी

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संस्कारों की स्थिति

संस्कार, दम तोड चुके हैं,

सरकारी आचरणों में।

 

नियम और कानून बचे हैं,

अब केवल संस्मरणों में।

 

अच्छे दिन वापस जा बैठे,

भाषा के व्याकरणों में।

 

स्कूलों के बंद होने पर,

बिल्कुल कोई नहीं बोला।

 

आज टैट की चिंगारी ने,

भडका डाला है, शोला।

 

भटक रही शिक्षा सड़कों पर,

ऐसा पहली बार हुआ ।

 

किसने आग लगा डाली है,

जो खिलजी बख्तियार हुआ ।

 

गांव गांव में शोर मचा है,

बिल्कुल हाहाकार हुआ ।

 

स्कूलों में सन्नाटा है,

शिक्षक भी लाचार हुआ ।

 

जनता केवल उलझी बैठी

जाति,धर्म और वर्णों में ।

 

अच्छे दिन वापस जा बैठे,

भाषा के व्याकरणों में ।

 

घनानंद ना छेड गुरु को,

मत छूना स्कूलों को ।

 

सरस सुहाने सुमनों को,

और रंग बिरंगे फूलों को।

 

चाणक्य नहीं माफ करेंगे,

फिर सत्ता की भूलों को।

 

सदा सुरक्षित देश रहा है,

गुरुओं के अनुकरणों में।

 

अच्छे दिन वापस जा बैठे,

भाषा के व्याकरणों में ।

 

अनुरूप सेवा शर्तों के,

सरकारी नौकरी पाये हैं ।

 

वर्षों बाद अचानक क्यों ,

कानून खोजकर लाये हैं ।

 

तुमने विषबाण चलाया हैं,

छुपकर न्यायिक आवरणों में ।

 

संस्कार दम तोड चुके हैं,

सरकारी आचरणों में ।

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स्थिति

🙏🌹❤️🙏
बहुत सुन्दर जी
गर हृदय भीतर दीप जलाये!
बात सुहानी होती!!
रोजगार और व्यापार से!
हर घर रोटी पानी होती!!
चुग चुग कागा शयाणा बन रहा!
कंकड़ छोड़ के मोती!!
आलस त्यागो, अब तो जागो!
शिक्षा ही दूर भगाये पनौती!!
जिस जिस ने झाड़ा पल्ला!
अन्याय अभागे को होती!!

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धृष्टता

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गंगा को गंदा कर डाला,
गैया को बिसार दिया तुमने।
धर्म को उसकी नगरी में,
कैसे धिक्कार दिया तुमने।
जातिवाद का जहर दिलों में,
कालकूट सा भर डाला।
जो हुआ नहीं था सदियों से,
वो काम तुम्हीं ने कर डाला ।
जिसने विश्वास किया तुम पर,
उसको ही मार दिया तुमने।

रचनाकार

धर्मेन्द्र ‘सरस’
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प्रस्तुति

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