श्रृंगार की छवि
भूमिका
भारतीय काव्य परंपरा में श्रृंगार केवल बाहरी सजावट का चित्रण नहीं है, बल्कि वह भाव, सौंदर्य और कोमल अनुभूतियों का संगम भी है। जब प्रकृति की सरलता, नारी की लज्जा, और मन की मधुर तरंगें एक साथ मिलती हैं, तब एक ऐसा दृश्य जन्म लेता है जो देखने वाले के मन में सहज ही रस की धारा बहा देता है।
कवयित्री विजया डालमिया की ये पंक्तियाँ उसी भावलोक का सुंदर चित्र उपस्थित करती हैं। यहाँ एक सुशोभित नारी का रूप केवल आभूषणों से नहीं, बल्कि उसकी सहज लज्जा, मुस्कान और प्रकृति से जुड़े परिवेश से और भी मनोहर बन उठता है। गगरी थामे कोमल हाथ, गजरे की श्वेत सुगंध, नथनी-बिंदी का श्रृंगार और जल की शीतल लहरें—ये सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं जिसमें सौंदर्य केवल देखा ही नहीं जाता, बल्कि महसूस भी किया जाता है।
इन पंक्तियों में कवयित्री ने बाह्य श्रृंगार के माध्यम से भीतर उमड़ते भावों की उस गागर को भी उकेरा है, जो अंततः चेतन-अचेतन की सीमा पार कर हृदय को भावविभोर कर देती है। यही इस काव्य का वास्तविक आकर्षण है।

कविता
रूप ये अनुपम धरा
श्रृंगार से पूर्ण किया
झुके नैन अधरित मुस्कान
सबका ही मन मोह लिया
कोमल हाथ थामे गगरी
कमल पुष्प खिला हुआ
गजरे की श्वेत खुशबू ने
चितवन को महका दिया
नथनी, बिंदी, टीका, हरवा
सब मिल दिल चुरा लिया
कंगन, झुमका, पायल ने
उर में शोर मचा दिया
शीतल जल लहरी ने
अछूता तन छू लिया
चेतन अचेतन हुआ
भाव गागर छलका गया
रचनाकार
विजया डालमिया
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





