भूमिका
प्रमिला त्रिवेदी की यह कविता आज की स्त्री केवल स्त्री की सामाजिक स्थिति पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि वह स्वयं लेखिका की गहन मानसिक यात्रा, अनुभवजन्य निष्कर्ष और परिवर्तन की चेतना का उद्घोष है। कविता में लेखिका की मनःस्थिति द्वंद्व से होकर स्पष्टता तक जाती दिखाई देती है—जहाँ एक ओर परंपरागत रूप से स्त्री में गिनी जाने वाली सब्र, सहनशीलता और त्याग जैसी गुणात्मक विशेषताओं को स्वीकार किया गया है, वहीं दूसरी ओर इन्हीं गुणों के अतिशय महिमामंडन से उपजे आत्म-ह्रास पर प्रश्न भी खड़े किए गए हैं।
यह रचना स्त्री और पुरुष के बीच विरोध नहीं, बल्कि संबंधों के पुनर्परिभाषण की आकांक्षा को सामने लाती है। लेखिका की मानसिकता यहाँ पीड़ित भाव से नहीं, बल्कि जागरण के स्वर से बोलती है। वह स्त्री को यह समझाने का प्रयास करती हैं कि मौन रहकर, झुककर, सहते हुए प्रेम या सम्मान पाना एक भ्रम है। यह भ्रम तोड़ना ही कविता का केंद्रीय भाव है।
कविता में लेखिका आज के पुरुष की मनःस्थिति को भी संतुलित दृष्टि से देखती हैं—वह पुरुष जो दासी नहीं, बल्कि सहचरी चाहता है; जो गुलामी नहीं, बल्कि दोस्ती, सहयात्रा और कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला संबंध चाहता है। इस प्रकार कविता स्त्री–पुरुष के बीच समानता, सहभागिता और भावनात्मक साझेदारी के अंतर्संबंध को सशक्त रूप में स्थापित करती है।
लेखिका की मनःस्थिति स्पष्ट रूप से आत्मविश्वास-केन्द्रित है। वह स्त्री को लाचार नहीं, बल्कि अपनी शक्ति भूल चुकी मानती हैं। इसलिए यह कविता उपदेश नहीं, बल्कि आत्म-स्मरण है—स्त्री को उसकी खोई हुई चेतना, निर्णय क्षमता और अधिकार-बोध से पुनः जोड़ने का प्रयास।
इस भूमिका में कविता को एक संवाद के रूप में देखा जा सकता है—
स्त्री से स्त्री का संवाद,
समाज से संवेदनशील प्रश्न,
और संबंधों में बराबरी की स्पष्ट घोषणा।
यही कारण है कि आज की स्त्री केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और मानसिक सशक्तिकरण का सार्थक दस्तावेज बन जाती है।
आज की स्त्री

तुममें बहुत सारी विशेषताएँ हैं,
सब्र, बर्दाश्त, हौसला है,
इतना सब्र और इतनी बर्दाश्त
करने की शक्ति है, के तुम कमजोर हो गईं,
दूसरों के कदमों में झुक जाने वाली,
हां किसी जमाने में, इस तरह की,
स्त्रियों की बड़ी तारीफ होती होगी,
पर अब नहीं है, अब अपने हक के लिए ,
हमें बोलना चाहिए, ये तुम्हारा भ्रम है,
कि ऐसे तुम सब के दिल में जगह बना लोगी,
तुम्हें अपने हक के लिए आवाज उठानी होगी,
आज के पुरुष तो ऐसा नहीं चाहते,
दिन भर गुलामी करने वाली,
पत्नी नहीं चाहते,
अपने साथ कंधे से कंधा मिलाकर,
साथ चलने वाली साथी चाहिए,
एक अच्छा दोस्त, दुःख सुख बाँटने वाला,
एक हमसफ़र, सच्चा साथी, यही तो दिल चाहता है।
तो क्यों अपने आप को लाचार, कमजोर समझ रही हो,
क्यों कंधे तलाश रही हो,
उठो आत्मविश्वास के साथ,
मजबूत क़दम बढ़ाओ अपने सच्चे साथी के साथ।
रचनाकार
प्रमिला त्रिवेदी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति



