अलाव
केदार शर्मा ‘निरीह’
रात का घना अंधकार,
घनी ठंड, घना कोहरा,
अलाव के कवच में,
सिमटी है अनेक सांसें।
धीरे-धीरे जमी हुई चर्चाएं पिघलती हैं,
कभी उबलती हैं,
और विलीन हो जाती हैं भाप बनकर।
अफसाने सुलगने लगते हैं,
कभी धुआं उठता है,
और! नम हो जाती हैं आंखें।
यादों की चिंगारियां, उड़ने लगती हैं।
तापना तो एक बहाना है, सच में तो भीतर का ताप मिटाना है।
समय के साथ, ठंडे होने लगे हैं अलाव, राख बुझी-बुझी सी है, जाने क्यों अलाव
उदास-उदास सा है।
सूचना स्रोत

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