अपनी अपनी बात

अपनी अपनी बात

।। अपनी-अपनी राह।।

गरीबों की गरीबी पर कोई तो है, जो तरस खाता है,
कोई है जो इनकी लाचारी को, समझ नहीं पाता है,
किसी निर्धन के घावों पर, मरहम लगा कर देखो तो,
उसकी एक मुस्कान पर हमें, कितना आनंद आता है।।

रचनाकार

श्री मुकेश कुमावत ‘मंगल’