बान्ध ‘परिण्डे’ डाली-डाली,चहक रही है,चिड़ियाँ काली।
फुदक-फुदक कर,चीं-चीं-चीं करती,आँगन बीच रेत में नहाती।
चोंच मारती, पंख खुजलाती, बैठ डाल पर, गीत सुनाती।
कभी इधर उड़े, कभी उधर उड़े, तिनका-तिनका, ले नीड़ घड़े।
दाना-पानी ढूंढ रही है, ललचाई सी देख रही है।
क्या तुम ?
उसको समझ रहे हो, मन में कुछ तुम! ठान रहे हो।
दाना-पानी छत पर पहुँचे, घर-घर पहुँचे यह संदेशा,
भूल न करना, ध्यान में रखना, कमी ना आए वहाँ हमेशा।
परोपकार सब करते रहना,इन जीवों पर,दया ही करना।
करें भरोसा, हम सब पर ये, सभी ‘परिण्डे’ पानी से भरना।
भूख प्यास से, मरे ना कोई, बना घोंसला सारी सोई।
घर का करे सुहाना कोना, देर सवेरे कोई न सोना।
भोर होय तब सब जग जातीं, सारे घर में धूम मचातीं।
कितनी सुन्दर? कितनी प्यारी ? मधुर लोरियाँ गाती सारी।
‘गौरैया’ जिद करती घर में, उछल कूद इठलाती पल में।
आओ हम संकल्प करें! बाँध ‘परिण्डा’ शुरुआत करें।
‘नायक’ बाबूलाल नायक