बसंत पंचमी पर विशेष
भारत में वर्ष को छह ऋतुओं में विभाजित किया गया है—
बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर।
इनमें से बसंत ऋतु का पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है।
बसंत वह ऋतु है, जब प्रकृति अपने पूर्ण सौंदर्य में होती है।
खेतों में लहलहाते सरसों के पीले फूल और गेहूँ की बालियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं, मानो धरती ने स्वर्णाभूषण धारण कर लिए हों। आम के वृक्षों पर नई कोपलें फूटती हैं, पक्षियों का कलरव वातावरण को उल्लास से भर देता है। चारों ओर ऐसा आनंद छा जाता है, जो मन और चेतना में नवीन ऊर्जा का संचार कर देता है। इसी कारण बसंत को ‘ऋतुराज बसंत’ कहा गया है।
लेखकों और सृजनशील व्यक्तियों के लिए कलम का विशेष महत्व होता है।
इसी दिन विद्या, ज्ञान और कला की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती का पूजन किया जाता है और उनसे प्रज्ञा, विवेक तथा सृजनशीलता का आशीर्वाद माँगा जाता है।
बसंत पंचमी का पौराणिक महत्व भी अत्यंत प्रेरणादायी है। मान्यता है कि जब श्रीराम माता सीता की खोज में दंडकारण्य वन पहुँचे थे, तब वे शबरी भीलनी की कुटिया में आए—वह दिन भी बसंत पंचमी का ही था।
आज के इस पावन अवसर पर हम माँ सरस्वती से प्रार्थना करें कि वे हमारे भीतर ज्ञान का दीप प्रज्वलित करें और अहंकार का विसर्जन हो।
इस शुभ दिन पर प्रभु को भोग अर्पित करें, स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें, दूसरों को भी खिलाएँ और खुशियाँ बाँटें। माँ सरस्वती का आशीर्वाद हम सभी पर बना रहे और हमारी लेखनी सशक्त, संवेदनशील और सार्थक बने।
इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ
बसंत पंचमी के पावन पर्व की आप सभी को आकाश भर शुभकामनाएँ। 😊🌹🙏
**प्रमिला त्रिवेदी**
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स्वरचित और मौलिक काव्य
ऋतुराज के स्वागत में प्रकृति श्रृंगारित है आज,
पीत वसन पीताम्बरी बसंत का हुआ आगाज,,
प्रसून और तितलियां परस्पर खिंचे चले आ रहे हैं।
कुसुम -कलिकायें और भंवरों का वही हाल है।
पूरी प्रकृति मिलन को बौराई नजर आती है।
बासंती धूम मची..प्रकृति श्रृंगार करे!
आम्र के नव पात खिले..बौर गुच्छों से भरे!
सरसों धानी चुनर में..देखो झूमती विहरे!!
गांव की गलियों से सिवान तक,
खेत से खलिहान तक
इसकी अनुगूंज की ठसक है।
ऋतुराज के आगमन का हर्ष चारों ओर है,
धरती करती श्रृंगार, नव कोपलों में उन्माद है।
सरस्वती देवी ने इस सृष्टि को ज्ञान दिया,
हर वस्तु में संगीत है प्रकृति में संगीत है
इसका बोध कराया, ध्वनि का निर्माण किया,
और धरा को सरस बनाया, हे मां वीणा पाणी
तम को दूर करो,
ऐसी विनती मां से करें।
रचनाकार

प्रमिला त्रिवेदी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति




