चौपाई छंद

चौपाई छंद

शबरी

कुटिया एक बनाकर रहती

राम द्वार आयेंगे कहती।

राह ताकती शबरी दिखती

राम नाम रटती ना थकती।

चित्र परिचय – अनंत पांडे के इंस्टाग्राम पेज से साभार

फल लाने को वन में जाती

मधुर मधुर भर झोली लाती।

राम वास्ते इन्हें सजाती

भजन राम के रहती गाती।

फूल सजा राहों में जगती

इधर उधर पथ सारे तकती।

पथ में देख राम को भागी

किस्मत उसकी अब थी जागी।

 

आसन पर उनको बिठलाया

निर्मल हो गई उसकी काया।

भूख लगी है शबरी बोली

गांठ वहीं बेरों की खोली।

 

चख चख बेर राम को देती

आशीष बराबर उनसे लेती।

राम प्रेम से खाते जाते

आनंद हृदय भर वो लाते।

रही भावना जिसकी जैसी

दिखती दुनिया उसको वैसी।

भेदभाव जो दिल में रखते

नहीं राम जी उनको दिखते।

 

बसे राम कण कण में मानो

पावन मन मंदिर में जानो।

दीन दुखी की करके सेवा

पा लोगे फिर इसका मेवा।

रचनाकार

श्योराज बम्बेरवाल ‘सेवक’

मालपुरा

प्रस्तुति