दिखावे के इस दौर में

दिखावे के इस दौर में

चेहरों पर मुस्कान बहुत है,

पर मन में सन्नाटा है,

रिश्तों की भीड़ खड़ी है फिर भी,

कौन किसके साथ निभाता है?

 

बातों में अपनापन बहुत है,

व्यवहारों में दूरी है,

हर कोई अच्छा दिखना चाहे,

पर! भीतर कितनी मजबूरी है?

 

आज यहाँ संवेदनाएँ भी,

कभी-कभी प्रदर्शन बन जाती हैं,

आँखें नम हों या मन टूटे,

तस्वीरें फिर भी मुस्काती हैं।

 

कुछ रिश्ते बस नाम के हैं,

कुछ रिश्ते मतलब से चलते हैं,

सच कह दो तो लोग बदलते,

मीठे झूठ पर हाथ मिलते हैं।

 

मैंने भी यह दुनिया देखी है,

चुप रहकर बहुत कुछ जाना है,

हर चमक सोना नहीं होती,

हर अपना अपना नहीं होता है।

 

अब दिखावे से दूर खड़ी हूँ,

मन को सच के पास रखती हूँ,

कम लोगों से रिश्ता रखकर,

दिल में सच्ची आस रखती हूँ।

 

मुझे भीड़ नहीं चाहिए अब,

बस दो दिल सच्चे मिल जाएँ,

बिना कहे जो दर्द समझें,

बिना दिखावे साथ निभाएँ।

 

क्योंकि जीवन छोटा-सा सफर है,

किस बात का इतना दिखावा?

अंत में साथ वही रह जाता,

जिसने सच में हाथ बढ़ाया।

 

चेहरा नहीं, चरित्र बोलें,

रिश्ते नहीं, संवेदना तौले—

काश इस दिखावे की दुनिया में,

हम फिर से इंसान बनें थोड़े।

सृजक

सरोज प्रसाद राय
उलझन सुलझन, स्थानीय संपादिका
जयपुर महिला प्रकोष्ठ

प्रस्तुति

उलझन सुलझन

सरोज प्रसाद राय