श्वेत सुगन्ध
चेतना रूपा वसंत पंचमी
ऋतुराज आया नहीं केवल धरा को सजाने,
यह आया है सोई हुई आत्मा को जगाने।
पीले पुष्पों में जो बिखरी है स्वर्णमयी आभा,
वह संकेत है कि भीतर भी फूटे ज्ञान की परिभाषा।
वीणा के तारों में छिपा है सृष्टि का स्पंदन,
मौन में जो गूँज रहा,
वही है ईश्वरीय वंदन।
सरस्वती का श्वेत वसन पवित्रता का प्रमाण है,
विकारों से मुक्त चित्त ही, ब्रह्म का सच्चा धाम है।
पुष्प खिलते हैं, क्योंकि वे स्वयं को समर्पित करते हैं!
हम क्यों अहम् की जकड़न में प्रति पल मरते हैं?
पत्ता गिरता है पुराना,
ताकि नया अंकुर फूट सके।
आध्यात्म वही जो मोह के हर बंधन को तोड़ सके।
हंस वाहिनी सिखाती है— ‘नीर-क्षीर’ का विवेक,
सत्य को अपनाएँ हम, तजकर असत्य अनेक।
सिर्फ़ कि़ताबों में नहीं, कण-कण में सरस्वती वास करे,
शुद्ध विचार ही मनुष्य का, सच्चा और पूर्ण विकास करे।
हे शारदे! इस वसंत एक ऐसी कृपा कर देना,
जड़ता के पतझड़ को, चेतन की हरियाली से भर देना।
शब्दों में प्राण फूँक दो, विचारों को विस्तार दो,
इस ‘अहं’ की वीणा को, ‘सोऽहम्’ का झंकार दो।
रचनाकार

-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद (गुजरात)

