एक प्रसंग रामायण का

एक प्रसंग रामायण का

एक प्रसंग रामायण का

आज़ प्रमिला जी ने रामायण के एक ऐसे पात्र पर
कविता लिखी है। जिसका आज तक भी बहिष्कार
होता है। आज भी कोई उसका नाम अपने बच्चे को नहीं देता।

माध्यम बनी मंथरा।
कैकेयी ने कलंक लगा लिया।
निज स्वार्थ त्यागकर।
परिशुद्ध प्रेम का प्रमाण दिया।
सब देवों का कार्य साधने।
साधु संत समाज के लिए।
अपना सर्वस्व लुटा दिया।
कैकेयी कलंक लगा लिया।

प्रेम तो वह भरत से ज्यादा
राम को किया करतीं थीं।
पर सौतेली का अपमान सहना।
निज स्वार्थ नहीं , परमार्थ के लिए।
कैकेयी ने कलंक लगा लिया।

अनंत युगों तक,अन्तस्थल में
उर्वर उपवन सुरभी को।
बंजर मरुस्थल बना दिया।
कैकेई ने कलंक लगा लिया।

उसके भीतर प्रेम प्रवाह था।
थी ममता की निर्मल धारा।
प्रेम पल्लवित होता भीतर।
बिखरे जिसके अंतस्थल में।
पर किस कालजयी प्रहरी का
आठों यम पहरा लगा दिया।
कैकेयी ने कलंक लगा लिया।

युग बीते पर कोई भी।
कैकेई नाम ना धर पाया।
ना कोप भवन तेरे भीतर।
अंतर्मन को आघात दिया।
निज स्वार्थ त्याग कर।
कैकेयी ने कलंक लगा लिया।

सृजक

प्रमिला त्रिवेदी

स्वरचित कविता
पाठ्य उन्नयन और चित्र सृजन

चैट जीपीटी (नवाचार सहायक)
कल्पनाकार है शब्दशिल्प

प्रस्तुति

प्रस्तुतकर्ता