एक रिश्ता ऐसा भी

एक रिश्ता ऐसा भी

एक रिश्ता ऐसा भी

 

तुमसे मेरा रिश्ता

सिर्फ किताबों तक नहीं है

मैं पथ हूँ जिस पर तुम्हें गुजर

अपनी मंज़िल से मिलना होगा

मैं धरा हूँ

तुम्हारा चलना,

दौड़ना और दौड़ते जाना

आनंदित और आनंदित करता है मुझे

क्यों की गर मैं नेत्र हूँ

तो तुम मेरी दूर दृष्टि,

तुम मेरे रोपित कोमल बीज हो

जो एक दिन वट वृक्ष बन

दुनिया के प्राणवायु बनोगे

तुमसे मेरा रिश्ता सिर्फ

किताबों तक नहीं है..

यह वो अटूट विश्वास है

जो असीम संभावनाओं से भरा हुआ है

क्योंकि मैं मार्गदर्शक हूँ

और तुम मुझे

शिक्षक के रूप में

जानते हो…।।

रचनाकार

Dr Naaz Parween ✍️

प्रस्तुति