ग़ज़ल
श्री लाल बिहारी शर्मा जी 'अनंत'

ग़ज़ल

❤️दिली कैफ़ियत❤️

इस दिल की बात को कभी समझा तो कीजिए।
मेरे दिल में फ़क़त आप हैं समझा तो कीजिए।

हर ज़ख़्म तो मरहम का तलबगार नहीं है,
कुछ ज़ख़्म लाइलाज़ हैं समझा तो कीजिए।

मेरी हँसी को आप हँसी में न लीजिए,
चेहरे में छुपे दर्द को समझा तो कीजिए।

कुछ लोग टूटकर भी शिकायत नहीं करते,
मैं भी उन्हीं में एक हूँ, समझा तो कीजिए।

हमने तो हर इक दर्द को अपना बना लिया,
ज़िन्दा हूँ, गुज़र चुका हूंँ पता कर तो लीजिए।

मेरे दिल की कैफ़ियत का अंदाज़ा हो अगर,
आँखों में झाँककर कभी गुफ़्तगू तो कीजिए।

गाहे – बगाहे ही सही , मिलिए ‘अनंत’ से,
कुछ अपनी कहके, उसकी भी सुन तो लीजिए।

सृजक

श्री लाल बिहारी शर्मा जी ‘अनंत’

मुम्बई , 21 सितम्बर 2026

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