सम्मान
हर्षा ठक्कर ‘हिना’ की रचना का मूल भाव अत्यंत स्पष्ट है—सम्मान की वास्तविक गरिमा, पात्रता और चयन की निष्पक्षता। इसमें कोई बड़ा असंगत अंश नहीं है, लेकिन स्व-नामांकन के पक्ष और उसके संभावित प्रभाव से जुड़े विचारों में कुछ पुनरावृत्ति थी। उसे समेटकर प्रवाह को अधिक सहज और चिंतनपरक बनाया जा सकता है।
सम्मान की तलाश
एक छोटा-सा विचार मन में आया—कभी सम्मान पाने वाले व्यक्ति को यह बताने की आवश्यकता नहीं होती थी कि “मैं इस सम्मान के योग्य हूँ।” उसके कार्य, प्रतिभा और समाज में योगदान को देखकर सम्मान देने वाले स्वयं उसे खोजते थे। सम्मान की गरिमा शायद इसी में थी कि पात्रता का निर्णय व्यक्ति स्वयं नहीं, बल्कि उसके कार्यों को देखकर दूसरे करते थे।
आज समय बदल गया है। अनेक संस्थाओं में सम्मान के लिए स्वयं नामांकन करना पड़ता है। व्यक्ति को अपने कार्यों और उपलब्धियों का विवरण देना होता है और कभी-कभी यह भी बताना पड़ता है कि वह सम्मान का पात्र क्यों है।
इसके पीछे एक व्यावहारिक पक्ष भी है। हर योग्य व्यक्ति को पहचानने वाले लोग हों, यह आवश्यक नहीं। अनेक प्रतिभाएँ अपने सीमित दायरे में निरंतर काम करती रहती हैं और स्वयं आगे न आएँ तो संभव है कि उनका योगदान व्यापक स्तर पर सामने ही न आ पाए। ऐसे में स्व-नामांकन को अवसर का माध्यम माना जा सकता है, अहंकार का नहीं।
फिर भी विचारणीय प्रश्न यह है कि जब सम्मान पाने की इच्छा, सम्मान के पीछे की साधना से बड़ी हो जाए, तो सम्मान की गरिमा कहीं कमजोर तो नहीं पड़ने लगती? अपनी उपलब्धियों को प्रस्तुत करना अनुचित नहीं, लेकिन स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ सम्मान के मूल उद्देश्य पर प्रश्न अवश्य खड़े कर सकती है।
इसलिए शायद प्रश्न स्व-नामांकन या पर-नामांकन का नहीं, बल्कि चयन की पारदर्शिता, पात्रता के निष्पक्ष आकलन और सम्मान के उद्देश्य का है।
क्योंकि सच्चा सम्मान केवल वह नहीं, जिसके लिए व्यक्ति स्वयं दरवाज़ा खटखटाए; सच्चा सम्मान तो वह है, जहाँ उसके कर्मों की दस्तक सुनकर सम्मान स्वयं उसके द्वार तक पहुँच जाए।
रचनाकार
हर्षा ठक्कर ‘हिना’