पारिवारिक स्नेह से सामाजिक समन्वय की ओर
हमारे पुरखे न्यास के प्रयासों की एक संक्षिप्त रिपोर्ट
प्रस्तुतकर्ता : श्री अशोक चौधरी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सात जिलों के मुस्लिम गुर्जर बहुल लगभग 180 गाँवों में से 130 गाँवों में परस्पर समन्वय स्थापित कर सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वहन की दिशा में हमारे पुरखे न्यास के तत्वावधान में एक महत्वपूर्ण प्रयास पूर्ण हुआ है। यह पहल किसी एक व्यक्ति या समूह का कार्य न होकर समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद, सहयोग और पारिवारिक भाव को मजबूत करने का साझा प्रयास है। इस क्रम में हमारे अग्रज श्री रमेश खटाना जी की विशेष भूमिका रही, वहीं सहारनपुर और शामली सहित अन्य जिलों में अनेक सामाजिक सहयोगियों ने अपने-अपने स्तर पर इस प्रयास को आगे बढ़ाया।
इस पहल का मूल उद्देश्य किसी धार्मिक या सामाजिक भिन्नता को रेखांकित करना नहीं, बल्कि समान सामाजिक एवं पारिवारिक जड़ों को समझते हुए आपसी संवाद और विश्वास को मजबूत करना है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में चल रहे इस प्रयास ने यह अनुभव कराया है कि जब समाज के लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख, परंपराओं और सामाजिक सरोकारों को समझने के लिए साथ बैठते हैं, तो अनेक पुरानी दूरियाँ सहज रूप से कम होने लगती हैं।
इसी क्रम में शामली जनपद के ग्राम तितरवाड़ा, तहसील कैराना में आयोजित पारिवारिक स्नेह रक्षाबंधन समारोह इस व्यापक प्रयास की एक सार्थक कड़ी रहा। समारोह में दोनों समुदायों के गणमान्य नागरिकों की सहभागिता रही और लगभग 300 लोगों की उपस्थिति ने इस पहल के प्रति सामाजिक स्वीकार्यता और उत्साह को अभिव्यक्त किया।
कार्यक्रम में यह विचार प्रमुखता से सामने आया कि गुर्जर समाज के लोग भले ही अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं का पालन करते हों, किंतु उनके सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में अनेक समान परंपराएँ, पारिवारिक संबंध और पूर्वजों से जुड़ी स्मृतियाँ विद्यमान हैं। इन समानताओं को समझना और उन्हें संवाद का आधार बनाना समाज में परस्पर विश्वास को बढ़ाने का एक सहज माध्यम हो सकता है।
विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया गया कि नियमित अंतराल पर आपस में बैठकर संवाद करना, एक-दूसरे की बात सुनना और प्रेम-सौहार्द बढ़ाने वाले सामूहिक कार्यक्रम आयोजित करना केवल किसी एक अवसर की गतिविधि न रहकर निरंतर सामाजिक प्रक्रिया बननी चाहिए। रक्षाबंधन जैसे पारिवारिक भाव से जुड़े अवसर इस प्रक्रिया को सहज और आत्मीय बनाने में उपयोगी हो सकते हैं।
कार्यक्रम की एक उल्लेखनीय विशेषता लगभग 20 मुस्लिम बहनों द्वारा अतिथियों को राखी बाँधना रहा। यह दृश्य किसी औपचारिक आयोजन से अधिक उस पारिवारिक भावना का प्रतीक बना, जिसमें भाई-बहन के रिश्ते को धार्मिक पहचान से ऊपर मानवीय स्नेह के रूप में अनुभव किया गया।
कार्यक्रम में व्यक्त विचारों में यह भावना भी सामने आई कि अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करते हुए एक ही सामाजिक मूल से जुड़े लोगों के बीच आपसी प्रेम, सहयोग और राष्ट्रहित की साझा सोच को मजबूत किया जा सकता है। सामाजिक एकता का अर्थ अपनी-अपनी आस्थाओं को छोड़ना नहीं, बल्कि भिन्नताओं के साथ परस्पर सम्मानपूर्वक आगे बढ़ना है।
हमारे पुरखे न्यास की यह पहल इसी सोच को व्यवहार में उतारने का प्रयास है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सात जिलों के गाँवों में प्रारंभ हुआ यह संवाद आगे भी नियमित संपर्क, पारिवारिक कार्यक्रमों और सामाजिक सहयोग के माध्यम से निरंतर आगे बढ़े—यही इस प्रयास की सार्थकता होगी।
उद्देश्य सरल है—पहचानें अलग हो सकती हैं, पर संवाद के द्वार खुले रहें; परंपराएँ अलग हो सकती हैं, पर पारिवारिक स्नेह बना रहे; और सामाजिक विविधता के बीच सहयोग की भावना निरंतर मजबूत होती रहे।
प्रस्तुति


