मैं कविता हूँ

मैं कविता हूँ

मैं कविता हूँ

मैं कविता हूँ

मैं रची जाती हूँ छंद और बंध से

लय और ताल से

मैं भाषायी चमत्कार हूँ,

मैं गाती हूँ लोगों के सुख दुःख,

उत्सव-पर्व, संयोग-वियोग

मुझमें मीरा की पीर है

सूर का वात्सल्य है

घनानंद की प्रीत है

जय शंकर का प्रलय है

कबीर की वाणी है,

रहीम के दोहे हैं

बिहारी की सतसैया है

मैं कविता हूँ

मुझमें नारी का श्रृंगार है,

प्रकृति का समाहार है ,

माँ की ममता है,

पिता की दृढ़ता है,

नन्ही बेटी की झंकार है,

विरहणी की पुकार है,

सावन की बूंदें हैं,

उष्ण की तपन है,

शीत ऋतु की ठिठुरन है

बसन्त का सौरभ है

मैं कविता हूँ

मुझमें आकाश के तारे हैं,

सूरज की किरणें हैं,

बादलों का नीर है,

वायु का वेग है,

धरती का फैलाव,

नदियों की रफ्तार है,

सागर की गहराई है

मैं कविता हूँ

मुझमें पूरी दुनिया समाई है।

रचनाकार

सन्दीप कुमार जैन ‘नवोदित’

ककोड, टोंक (राजस्थान)

प्रस्तुति