मैं मीठे गीत लिखूँ कैसे?
आस्तीन में साँप मिले,
फूलों में काँटे मिलते हैं।
गंगा जल बहता नाली में,
कीचड़ में पंकज खिलते हैं।
शत्रु भाव से भरे हुए जो,
उनको मीत लिखूँ कैसे?
मैं मीठे गीत लिखूँ कैसे?
अपने बनते रहते हैं जो,
अपनत्व नहीं उनके मन में।
अमृत जैसी रसना से जो,
विष बीज बो रहे जीवन में।।
मैं शुष्क हृदय ले खड़ा हुआ,
निर्झर सा आर्द्र दिखूँ कैसे?
मैं मीठे गीत लिखूँ कैसे?
मैं कटु शब्दों का वाहक हूँ,
पर झूठा मेरा संग नहीं।
है श्वेत-श्याम व्यवहार भले,
पर गिरगिट से हैं रंग नहीं।।
मैं जीवन रण से हार चुका,
निज हार को जीत लिखूँ कैसे?
मैं मीठे गीत लिखूँ कैसे?
Creator
…dAyA shArmA