जब किसी इंसान की बर्बर हत्या केवल इस आधार पर हो कि वह अलग धर्म का है, तो धर्म.. मुझे दुनिया की सर्वाधिक घृणित अवधारणा लगती है।
यह स्वाभाविक है- युद्ध, हत्या, बलात्कार तथा अन्य दूसरे प्रकार के अपराध होते रहेंगे। ये मानव की आक्रामक प्रकृति द्वारा जनित है। परंतु जब धर्म के आधार पर युद्ध, हत्या, बलात्कार हो तो परिणाम कल्पना से भयावह होते हैं।
संसार के अधिकांश धर्मो के ग्रंथ हिंसक नीतियों से भरे पड़े हैं। जो हिंसा का समर्थन करता हो, मुझे धर्म का वह स्वरूप कतई स्वीकार्य नहीं है।
धर्म के आधार पर होने वाले अपराध एक बड़े जन समूह को प्रभावित करते हैं। धर्म के आधार पर जब हिंसा हो,,, आग की ऐसी लपटे निकलती है जो सब कुछ खाक कर देती हैं। पीछे केवल विधवाओं का विलाप और बच्चों की किलकारियां बचती हैं।
इतिहास कितनी बार इसके मानवीय विनाश को देख चुका है क्या बुद्धि इतनी मालिन हो गई है कि इतिहास भी सबक नहीं दे रहा है।
क्या सूर्य किसी विशेष धर्म के अनुयायियों के निकलता है?
क्या हवा किसी विशेष धर्म के अनुयायियों के क्षेत्र में बहती है?
क्या पानी विशेष धर्म के अनुयायियों की प्यास बुझाता है और उन्हें ही शीतलता देता है?
प्रकृति ने धर्म के आधार पर कहां भेदभाव किया है? प्रकृति और ईश्वरीय व्यवस्था ने कहां संकेत किया है कि अमुक धर्म छोटा है और अमुक धर्म बड़ा है?
रचनाकार

रामपुर मनिहारान, सहारनपुर
प्रस्तुति


