भाषाओं आधारित शोधों की जरूरत
प्राचीन और अर्वाचीन भारत की भाषाओं, साहित्य, कला और संस्कृति पर वैज्ञानिक शोध की आज बड़ी जरूरत है। खासकर अपभ्रंश या स्थानीय बोलियों से विकसित हुई भाषा‑साहित्य पर, जैसे गुर्जरी भाषा, ध्यान देने योग्य है। गुर्जरी भाषा में प्रचुर साहित्य उपलब्ध है; इसे छोड़ना या उपेक्षित करना भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास और संस्कृति को अधूरा रखेगा।

गुर्जर इतिहास भाषा साहित्य शोध संस्थान ने अखंड भारत के संदर्भ में गुर्जरी भाषा, साहित्य, कला और संस्कृति का व्यवस्थित अध्ययन शुरू किया है। इसका उद्देश्य उन विकृतियों को दूर करना है, जो कुछ शक्तियों ने सोलहवीं शताब्दी से इतिहास पर थोप दी थीं, और गुर्जरत्रा लोक संस्कृति का सही एवं अखंड इतिहास प्रस्तुत करना है।
इतिहास, साहित्य और संस्कृति के निष्पक्ष लेखन के लिए संस्कृत, पाली, प्राकृत तथा गुर्जरी अरु अपभ्रंश साहित्य का वैज्ञानिक विश्लेषण अनिवार्य है। प्राचीन भारत में किसी भाषा के विकास से पहले लोक बोली का अस्तित्व स्वीकार करना ही तर्कसंगत है। लोक साहित्य, अपनी जीवंतता से, साहित्यिक भाषाओं में निहित भाव‑तरंगों को मुखर बनाता है।
अखंड भारत के साहित्य तथा ऐतिहासिक धार्मिक ग्रंथों के साथ-साथ लोक परक साहित्य भी मौजूद है। ये लोक परक साहित्य ऐतिहासिक, अर्ध‑ऐतिहासिक, विदेशी विवरण, जीवनियाँ, युद्ध, कल्पना और गद्य‑कथा आदि रूपों में प्रकट होते हैं।
गुर्जरत्रा लोक संस्कृति के इतिहास का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। प्राचीन सूर्य, चंद्र, अग्नि गुर्जर राज्यवंशों के इतिहास में राजाओं, उत्तराधिकारियों, शासन‑व्यवस्था के साथ आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां भी स्पष्ट रूप से मिलती हैं। इन वंशों की शुरुआत सूर्य‑चंद्र‑अग्नि से मानी जाती है। इनकी प्रमाणित कथाएँ महाकाव्यों और कल्हण की राजतरंगिणी जैसे ग्रंथों में मिलती हैं। कल्हण ने कश्मीर का संपूर्ण इतिहास आदिकाल से अपने समय तक लिखा; यह ग्रंथ ऐतिहासिक स्रोतों के परिप्रेक्ष्य में उच्च माना जाता है। ([Encyclopedia Britannica][1])
प्राकृत, पाली और गुर्जरी अपभ्रंश में अखंड भारत के साहित्य एवं संस्कृति का इतिहास उपलब्ध है। गुर्जरत्रा का इतिहास वीरों के गुणगान, स्मृतियों और सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से पुनर्लेखन मिलता है।
उदाहरण के रूप में:
* सोमेश्वर की राजमाला और कीर्ति कौमुदी,
* अरि सिंह के सुकृति‑कीर्तन,
* राजशेखर के प्रबंधकोष,
* जय सिंह के हमीर मर्दन,
* वस्तु पाल की तेजपाल प्रशस्ति,
* मेनरूतुग का प्रबंध चिंतामणि,
* उदय प्रभा की सुकृति, कल्लोलिनि,
* बालचंद्र का वसंत विलास, आदि।
इन ग्रंथों में गुर्जरात्रा संस्कृति का इतिहास स्पष्ट रूप से मुखरित है। साथ ही चालुक्य वंश और उसके पूर्वजों के इतिहास का भी जीवंत वर्णन मिलता है।
गुर्जरात्रा के दृष्टिकोण से उत्तर और दक्षिण भारत में छोटे‑छोटे राज्यवंश भी सूर्य, चंद्र, अग्नि गुर्जर राजवंशों से जुड़े रहे। इन राज्यवंशों का काल राजनीतिक उठापटक से भरा रहा। उदाहरण हैं: गुर्जर प्रतिहार, कन्नौज के यशोवर्मन, कामरूप, नेपाल, कश्मीर, कर्कोटक राजवंश, उत्पल वंश, तथा मंडोर, भीनमाल, कन्नौज, गाहड़वाल, शाकंभरी चौहान, बुंदेलखंड चंदेल, मालवा परमार, अन्हिलवाड़ा सोलंकी, त्रिपुरी कल्चुरी, बंगाल पाल आदि। ऐतिहासिक दृष्टि से ये सभी किसी न किसी रूप में गुर्जरात्रा लोक संस्कृति के अंग रहे हैं।
गुर्जरी भाषा के लोक साहित्य में श्री देवनारायण फ़ढ़ैं लोकवार्ता का विशेष महत्व है। बगड़ावत श्री देवनारायण महागाथा में गुर्जरत्रा लोक संस्कृति प्रतीकात्मक रूप से विद्यमान है। प्रत्येक प्रतीक का अर्थ उसके सांस्कृतिक मूल और संदर्भ से जुड़ा है, जिसे समझने के लिए उस संदर्भ का ज्ञान आवश्यक है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में 22 भाषाओं के विभिन्न रूप, भेद और क्षेत्रीय बोलियों में लोक साहित्य उपलब्ध है। यह लोक साहित्य पौराणिक, ऐतिहासिक, या लोक कथाओं का संग्रह है, जिसमें कथ्य का अर्थ संदर्भ से निकलता है। लोककथा, कहावतें, पहेलियाँ, लोकगीत, आख्यान, वर्णनात्मक गद्य आदि सभी सांस्कृतिक तत्वों को समेटे रहते हैं। लोकवार्ता विशेष रूप से गतिशील रूपक है, जो संवाद, प्रश्न‑उत्तर, पुनर्रचना और सृजन का माध्यम बनती है।
लोक साहित्य बच्चों, परिवार और समुदाय के भीतर सांकेतिक भाषा की तरह समाया रहता है। जहाँ भी लोग रहते हैं, वहाँ लोक साहित्य फलता‑फूलता है, मुंह‑दर‑मुंह फैलता है। यह नृत्य, खेल, अल्पनाएँ, शिल्प, प्रदर्शन, कठपुतली, लोक नाटक, वेशभूषा, व्यंजनात्मक रूप, सामाजिक रीति‑रिवाज, व्यवसाय, कला, धर्म, अर्थ—सब में प्रवेश करता है। व्यक्ति का स्वभाव, सौंदर्य बोध और विश्वदृष्टि बचपन में आकार लेते हैं; जीवन के अनुभव इन्हें और गहरा करते हैं। यही सब शाब्दिक और शब्दातीत परंपराएँ बनाती हैं।
लोक संस्कृति के अध्ययन के लिए कहा जा सकता है कि उसे लोक जीवन की रोशनी में ढूँढ़ना चाहिए। जैसे हम घर में चाबियों की तलाश करते हैं, कभी आवश्यक चाबी न मिलते हुए भी हमें कुछ नया या पुराना मिलता है—ठीक वैसे ही लोक जीवन में हमें नए तत्व मिलते हैं जो हमें पहले नहीं मालूम थे। बगड़ावत श्री देवनारायण महागाथा और लोकवार्ता के गहन अध्ययन में ऐसा ही अनुभव सामने आता है।
अखंड भारत उपमहाद्वीप में असल में अनेक भारत हैं—भाषाओं, लिपियों, संप्रदायों, धर्मों, लोकजीवन परंपराओं की विविधता। 1961 की जनगणना में 1652 मातृ भाषाओं और 105 मूल भाषा‑परिवारों से संबंधित बोलियों का संकेत मिलता है। लोकजीवन एवं तत्वचिंतन की दृष्टि से भाव और विचार भी पदार्थ जैसे हैं; भौतिक और अभौतिक, स्थूल और सूक्ष्म परस्पर रूपांतरण में रहते हैं। मानवीय इच्छाएँ और आवेश विभिन्न रूप धारण करते हैं; यही सब संस्कृति गढ़ते हैं।
लोकजीवन की इन व्यापक प्रक्रियाओं में संस्कृति का आधार लिखा ग्रंथ नहीं, बल्कि मौखिक परंपराएँ और निरंतर संवाद होता है—अतीत और वर्तमान, शाब्दिक और शब्दातीत एक दूसरे को पुनर्स्थापित और रूपांतरित करते हैं। संस्कृत, पाली, प्राकृत और गुर्जरी अपभ्रंश इन सभी का विस्तार अखंड भारतीय उपमहाद्वीप में रहा है; इनके स्रोत आंचलिक हैं। भारतीय सभी दर्शन अंतर्निहित लोकजीवन से पोषित हैं।
गुर्जर लोक जीवन में बगड़ावत श्री देवनारायण महागाथा और लोकवार्ता राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में विशेष प्रभाव रखती है। यह गाथा मध्यकाल में गुर्जर राज्यवंशों के युद्ध और संघर्षों के माध्यम से लोकजीवन को रेखांकित करती है। चौहान वंश के बगड़ावत एवं गुर्जर प्रतिहारों के युद्ध, बगड़ावत बंधुओं की वीरगति, तथा सवाई भोंज की पत्नी साडू को दिए वचनों के अनुसार श्री देवनारायण का कमल‑पुष्प में अवतार—ये सभी कथानक गाथा के महत्वपूर्ण भाग हैं।
साडू माता श्री देवनारायण का पालन‑पोषण करती है। श्री देवनारायण उज्जैन‑देवास से गढ़ गोठा लौटते हुए पूर्वजो की संपत्ति और बैर लेने के लिए बिछड़े बंधुओं को इकट्ठा करते हैं। यह कथन प्रतीकात्मक है, जो वर्तमान में विभिन्न संप्रदाय, धर्म और उपजाति नामों से विद्यमान गुर्जरों को एकजुट करने का संदेश देता है।
साडू माता अपने कुल शत्रुओं के भय से श्री देवनारायण और पशुधन लेकर मालवा देवास जाती है। श्री देवनारायण मालवा में बाल लीलाओं से अपने चमत्कार दिखाते हैं। उनके खेल‑कूद में राण और गढ़ गोठा का निर्माण होता है, वे विजय प्राप्त करते हैं और राजपाट पुनः प्राप्त करते हैं। साडू माता उन्हें पूर्वजों की सच्चाई से अनभिज्ञ रखती है।
मालवा में श्री देवनारायण अपने नाना के गौ चराते हैं, बाल लीलाओं में चमत्कार दिखाते हैं, और लोग उन्हें देव विभूति समझने लगते हैं। जब छोंछू भाट मालवा आता है, साडू माता डरती है कि भाट पूर्वजों की बैर की स्मृति दिला देगा। वह छोंछू भाट के लिए विष मिश्रित भोजन तैयार करती है, पर श्री देवनारायण स्वयं वह भोजन ग्रहण कर लेते हैं। साडू माता भयभीत होती है। श्री देवनारायण अपने भीतर पूर्ण विराट सृष्टि का दर्शन करवा कर उन्हें आश्वस्त करते हैं।
उज्जैन के सिद्धवट पर 52 भैरव और 64 जोगणिया से युद्ध करके वे अपने कुल भाट छोंछू को पुनर्जीवित करते हैं, जिन्हें जोगीणियों ने भक्षण कर लिया था।
धार नगरी के राजा की राजकुमारी पींपलदे के कोड़ का निवारण कर वे उससे विवाह करते हैं। पींपलदे का पूर्व जन्म जयमती बतलाया जाता है; वह धार के राजा की अंधी, पंगु और कोड़ी पुत्री के रूप में जन्मी थीं, जिसका श्राप का कारण बताया जाता है।
श्री देवनारायण मालवा में अचल देवी के मान को भी चुनौती देते हैं और अपनी पूजा प्रारंभ करवाते हैं। ननिहाल से गढ़ गोठा लौटते समय वे अपनी मामियों से आग्रह स्वीकार करते हैं और छोंछू भाट से अपनी तस्वीर चतरा छिपा से बनवाने कहते हैं। छोंछू भाट चतरा छिपा से श्री देवनारायण फड़ैं का निर्माण करता है। यह चित्र ब्रह्मांड सृष्टि से लेकर सभी अवतार, महाभारत, रामायण, वेद, पुराण, उपनिषद एवं अखंड भारतीय उपमहाद्वीप की पूर्ण संस्कृति को प्रतीकिकृत करता है।
बगड़ावत भारत की लोकवार्ता में यह कथा आज भी लोक समाज द्वारा भागवत स्वरूप पूजा‑अर्चना, स्मरण और लोकचर्या के रूप में जीवित है।
सूचना स्रोत
मोहनलाल वर्मा
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
गुर्जर इतिहास भाषा साहित्य शोध संस्थान, पंजीकृत कार्यालय, सीकर, राजस्थान।
फोन: 9782655549
सुधार के सहायक: https://www.britannica.com/topic/Rajatarangini “Rajatarangini | Sanskrit, Chronicle, Meaning, & Facts | Britannica”
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति



