सार छंद
पर्यावरण
उर में हम संकल्प जगाकर ,
घर- घर अलख जगाएँ ।
हरित धरा नीले अम्बर को
फिर से हँसता पाएँ ।।
वृक्षों की छाया है खोई,
वापस उसे बुलाएँ ।
नदियों को स्वच्छंद बहाकर,
कल -कल नाद सुनाएँ ।।
धुएँ ,शोर से त्रस्त हुई माँ,
आओ,वृक्ष लगाएँ ।
उनके कटने की पीड़ा को,
जन -जन को समझाएँ ।।
मस्त हवाएँ चलती हैं जब,
झूमे पत्ते डाली
हरियाली जग में मुस्काये,
मिलती है खुशहाली ।।
हरियाली की ठंडी छाया
हर पंछी को भाएँ ।
पर्वत बोले,झरना झर-झर,
कोयल गीत सुनाएँ ।।
पेड़ों के झूले पर बैठे,
बादल खेल रचाएँ ।
मौसम जब मुस्कान बने तो,
मनसुख गुनगुन गाएँ ।।
नभ में विहग उड़ाने भरते
कलरव करते सारे ।
रंग-बिरंगे नीले पीले
लगते सबको प्यारे ।।
शब्द रूप ले उतरे कविता
चमके चंदा तारे।
खेत लबालब भर पानी से,
उगले सोना धरती।
हरी भरी हो धरती माता, झोली सबकी भरती।
जीवन शक्ति वृक्ष
काट रहे हो जब पेडों को मेघ कहाँ से बरसेगें ।
वृक्षों को तुम मित्र बनाओ खुशहाली तुमको देगें ।।
अवनि- अम्बर तपन है फैली,आग उगलता है सूरज ।
तरुवर को तुम गले लगाओ मेघा बरसे धरती पर।।
अंधाधुंध पेड़ हैं काटे,प्रलय धरा पर आयेगी ।
वृक्ष लगाओ, संरक्षण दो ,हरियाली छा जायेगी ।।
नव रोपण पौधों को लगायें,हरी भरी रहती धरती ।
धरती का श्रृंगार करे,शोभा इसकी न्यारी भली ।।
लुटा खजाना ममता का उपकार सदा जन पर करते ।
संरक्षण दे जीव-जंतु को आश्रय स्थल है बनते ।।
प्राणवायु-अक्षय भंडार,जग के हैं ये जीवन दाता।
पर्यावरण संरक्षण से कारण बन जाते वर्षा का।।
विषैली गैसों का चोषण,औषधीय भंडार घने।
ज्ञान- विहार के भंडार, वन संस्कृति के रक्षक बने ।।
बेध्यानी कुल्हाड़ी से तू हाथ-पैर क्यों काटे है ।
स्वार्थ हित विनाश का तांडव मन में क्यों है ठाने है।।
प्रकृति सुषमा जीवन शक्ति नयनों को अभिराम लगे ।
वृक्षों से नदियों का कलकल,पंछी कलरव गान मिले।।
नन्हें बालक सा पालन कर, संस्कृति को पहचान मिले।
जग उपवन महक उठेगा जल अमृत संसार- मिले।।
—–डॉo छाया शर्मा, अजमेर
राजस्थान
