ख़ामोश
तुमने बाग उजाड़े खामोशी से,
वो देखता रहा
तुमने जमीन खोदी गर्मजोशी से
वो देखता रहा
तुमने जलाए जंगल, आशियाने छीने
वो खामोश रहा
जानवरों की चीखें पहाड़ों का सीना चीरते गए
उसने कुछ न कहा
पंछियों का विलाप मदद की गुहार लगाता रहा
वो हिला नहीं
फिर एक दिन
उसकी खामोशी टूटी
चारों ओर अंधेरा था
बादल फटे
नदियों ने सीमाएं लांघी
जंगल ने किनारा किया
पहाड़ों ने रास्ते दिए
लोगों ने शिकायतें की
दुआएं मांगी
वो खामोश रहा
उसने कुछ न सुना।।
लेखिका

स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
नोएडा (उत्तर प्रदेश)
कल्पनाकार

प्रस्तुति

