कविता

कविता

जीना इसी का नाम है

टूटे ख्वाबों को भी
जोड़ लेते हैं
थक कर हो चूर
फ़िर भी उठ खड़े होते हैं
जीना इसी का नाम है

खो जाएं अंधेरों में
फ़िर भी रास्ता खोज ही लेते हैं
रो लें कितना ही
फ़िर भी हंसना सीख लेते हैं
जीना इसी का नाम है

हो कितनी ही उदासी
फ़िर भी मुस्कुरा ही लेते हैं
हों कितने ही बेचैन
फ़िर भी सुकून खोज ही लेते हैं
जीना इसी का नाम है

लगे ये जीवन खाली-खाली
फ़िर भी इसे भर ही लेते हैं
लगे कभी सब कुछ बेगाना
फ़िर भी जीवन अपना ही लेते हैं
जीना इसी का नाम है

सृजक


सुनिता मीना
उपप्राचार्य एवं  स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन,

महिला प्रकोष्ठ
सवाई माधोपुर (राज.)

प्रस्तुति

उलझन सुलझन