कविता
प्रस्तुतकर्ता

कविता

नेकी

चल नेकी कमाते हैं
कुछ जिंदगियाँ बनाते हैं
भटकों को राह नई दिखाते हैं
चल नेकी कमाते हैं

रोजा, व्रत, नमाज़े, प्राथनाएँ
सब करनी है मुझे
चल पहले किसी अनपढ़
को पढ़ाते हैं
चल नेकी कमाते हैं

थोड़ा-थोड़ा कर्ज सबका है मुझमें
चल पहले फर्ज
मिट्टी का चुकाते हैं
काँटों को बटोर
पेड़ फलों के लगाते हैं
चल नेकी कमाते हैं…

सब कहते हैं
शब्दों में बड़ी लचक, मिठास,
नरमी है तेरे,
चल विचारों में बदलाव लाने की
कसम कोई खाते हैं
सूखे हुए चेहरों की
खोई मुस्कान लौटाते हैं
चल नेकी कमाते हैं…

खुदा ने बराबर बख्शी है
मोहब्बत दिलों में
ये बात हवाओं को बताते हैं
किसी चिराग को बुझने से बचाते हैं
चल नेकी कमाते हैं.. ।

रचनाकार

डॉ नाज़ परवीन

स्वरचित कविता ✍️

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति