चौपाई छंद
।।घर परिवार।।
घर परिवार ज्ञान सिखलाता
झोली भर भर खुशियां लाता।
साथ सभी को रखता अपने
दिखलाता है सच के सपने।
मात पिता अरु दादा दादी
करवाते हैं सबकी शादी।
बच्चों की गूंजे किलकारी
सजती है फिर ये फुलवारी।
नई नवेली दुल्हन आती
सजा साथ ही खुशियां लाती।
घर को मिलता नया जवाई
देख जिसे बेटी है हर्षाई।
नये नये बनते हैं रिश्ते
चलता जीवन हॅंसते हॅंसते।
संकट घर पर जब है आते
एक सभी अपने हो जाते।
हिम्मतवाला
हिम्मत वाला बाॅंधे हाथी,
खाली बैठा मारे माखी
कोई पहने कोट फनाफन,
कोई पहना वर्दी खाखी।
कोई उधार ले घी पीता,
काम करें कोई बराबर
कोई सच को सच कहता है,
कोई बोले झूठ सरासर।
चमचों की ये प्यारी दुनिया,
कर जाती है प्लेट सफाचट
काम करें बस करने वाला,
करते हैं ये बात फटाफट।
बातूनी दुनिया में यारों,
झूठों की चलती है तूती
रहे नहीं अब लोग यहां पर,
जो दिखलाये इनको जूती।
खेत किसानी वीरों वाली,
कोई कह मजदूरों वाली
पर दुनिया में लोग भरे हैं,
जो लोगों को समझें हाली।
कुण्डलिया छंद
।।सर्दी एक।।
सर्दी में लगती हमें,सदा सुहावन धूप।
धूप बिना है ठिठुरते,रंक सिंह सब भूप।।
रंक सिंह सब भूप,सभी दुबके हैं रहते ।
ओढ़ रजाई एक,लोग सर्दी को सहते।।
कह सेवक कवि राय,बदल लेते हैं वर्दी।
खाने में बदलाव,करें जब आती सर्दी।।
।।सर्दी दो।।
रखना सर्दी में सदा,जाड़े का जी ध्यान।
जाड़ा लग जाता अगर,सुनते कम है कान।।
सुनते कम है कान,नाक दोनों ही बहते।
साथ आती बुखार,जिसे रहते हम सहते।।
कह सेवक कवि राय,मजा जीवन का चखना।
रहना कुछ भी ओढ, ध्यान सर्दी का रखना।।
रचनाकार
श्योराज बम्बेरवाल ‘सेवक’
मालपुरा

