क्वांटम भौतिकी और अध्यात्म

क्वांटम भौतिकी और अध्यात्म

‘क्वांटम भौतिकी और अध्यात्म’

क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) और अध्यात्म के बीच का संबंध आधुनिक युग के सबसे रोमांचक विषयों में से एक है। जहाँ पुराने समय में विज्ञान और धर्म को अलग-अलग ध्रुव माना जाता था, वहीं आज सूक्ष्म स्तर पर भौतिक विज्ञान की खोजें प्राचीन आध्यात्मिक मान्यताओं के बहुत क़रीब पहुँच रही हैं।

यहां इनके बीच के मुख्य कड़ियों का विश्लेषण दिया गया है:

सब कुछ ऊर्जा है (The Field of Energy)

क्वांटम भौतिकी: वैज्ञानिकों ने पाया कि जब हम परमाणु (Atom) के भीतर गहराई में जाते हैं, तो वहाँ कुछ भी “ठोस” नहीं है। पदार्थ वास्तव में ऊर्जा का कंपन (Vibrations) और ‘क्वांटम फील्ड’ मात्र है।

अध्यात्म: उपनिषदों और वेदों में हजारों साल पहले कहा गया था—”सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (यह सब कुछ ब्रह्म या चेतना ही है)। जिसे हम ठोस संसार कहते हैं, वह ‘माया’ या ऊर्जा का एक रूप है।

 प्रेक्षक का प्रभाव

(The Observer Effect)

क्वांटम भौतिकी का सबसे हैरान करने वाला प्रयोग ‘डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट’ है। यह बताता है कि:

विज्ञान: जब तक किसी कण को देखा नहीं जाता, वह एक ‘लहर’ (Wave) की तरह व्यवहार करता है, लेकिन जैसे ही कोई उसे देखता है, वह एक ‘कण’ (Particle) बन जाता है। यानी हमारे देखने (Consciousness) से भौतिक वास्तविकता बदल जाती है।

अध्यात्म: यह विचार सीधे तौर पर अद्वैत दर्शन से मेल खाता है, जो कहता है कि ‘द्रष्टा’ (देखने वाला) और ‘दृश्य’ (देखी जा सकने वाली) वस्तु अलग नहीं है। हमारी चेतना ही संसार की रचना करती है।

 क्वांटम एंटैंगलमेंट

(Quantum Entanglement)

विज्ञान: यह सिद्धांत कहता है कि ब्रह्मांड में दो कण एक-दूसरे से इतनी गहराई से जुड़े हो सकते हैं कि एक कण में होने वाला बदलाव तुरंत दूसरे कण को प्रभावित करता है, चाहे वे ब्रह्मांड के दो अलग कोनों में ही क्यों न हों। इसे आइंस्टीन ने “Spooky action at a distance” कहा था।

अध्यात्म: यह ‘एकत्व’ (Oneness) के सिद्धांत की पुष्टि करता है। अध्यात्म कहता है कि हम सब एक ही सूक्ष्म सूत्र से जुड़े हैं। “वसुधैव कुटुंबकम्” केवल एक सामाजिक विचार नहीं, बल्कि एक ब्रह्मांडीय सत्य है।

शून्यता और पूर्णता (The Void)

विज्ञान: क्वांटम वैक्यूम (Quantum Vacuum) का अर्थ ‘खालीपन’ नहीं है, बल्कि यह असीमित ऊर्जा की संभावनाओं से भरा क्षेत्र है जहाँ से कण प्रकट और विलीन होते हैं।

अध्यात्म: बुद्ध का ‘शून्यवाद’ या शिव का ‘शून्य’ रूप यही दर्शाता है। शून्य ही वह स्रोत है जहाँ से सृजन होता है और अंत में सब उसी में समा जाता है।

विज्ञान और आध्यात्म: ऊर्जा, पदार्थ और सत्य की खोज:-

​मानव सभ्यता का इतिहास हमेशा से ‘सत्य’ की ख़ोज का इतिहास रहा है। इस ख़ोज के दो मुख्य मार्ग रहें हैं—एक विज्ञान, जो बाहरी जगत, पदार्थ और गणनाओं पर आधारित है, और दूसरा आध्यात्म, जो आंतरिक चेतना, ऊर्जा और आत्म-साक्षात्कार पर केंद्रित है।

​पदार्थ और ऊर्जा का संघर्ष-

​विज्ञान हमें बताता है कि यह ब्रह्मांड पदार्थ (Matter) से बना है, लेकिन आधुनिक भौतिकी (जैसे क्वांटम मैकेनिक्स) के अनुसार, पदार्थ का अंतिम आधार ऊर्जा (Energy) ही है। आइंस्टीन का प्रसिद्ध समीकरण E=mc^2 इस बात की पुष्टि करता है कि ऊर्जा और पदार्थ एक-दूसरे के ही रूप हैं।

​आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, जिसे विज्ञान ‘ऊर्जा’ कहता है, उसे ही ऋषि-मुनियों ने ‘प्राण’ या ‘चेतना’ कहा है। जिसे हम ठोस पदार्थ समझते हैं, वह वास्तव में उस अनंत चेतना का ही एक घनीभूत रूप है। इन दोनों के बीच का संघर्ष दरअसल हमारी समझ का संघर्ष है कि सत्य ‘दृश्य’ (पदार्थ) में है या ‘अदृश्य’ (ऊर्जा) में।

​सत्य की खोज: दो किनारे, एक ही नदी!

​विज्ञान ‘कैसे’ का उत्तर देता है—जैसे कि ब्रह्मांड कैसे बना? कोशिकाएँ कैसे काम करती हैं? वहीं आध्यात्म ‘क्यों’ का उत्तर ढूंढता है—हम यहाँ क्यों हैं? जीवन का उद्देश्य क्या है?

​वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह तर्क, प्रमाण और प्रयोगों पर टिका है। यह हमें बाहरी सुख-सुविधा और ब्रह्मांड के रहस्यों की जानकारी देता है।

​आध्यात्मिक दृष्टिकोण: यह अनुभव, ध्यान और अंतर्दृष्टि पर टिका है। यह हमें मन की शांति और अस्तित्व की एकता का बोध कराता है।

​आज के युग में विज्ञान और आध्यात्म को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि पूरक मानने की आवश्यकता है। बिना आध्यात्म के विज्ञान दिशाहीन हो सकता है (जैसे विनाशकारी हथियार), और बिना विज्ञान के आध्यात्म अंधविश्वास की ओर झुक सकता है।

​यह उस ‘परम सत्य’ को दर्शाता है जहाँ पहुँचने के लिए हमें वैज्ञानिक बुद्धि और आध्यात्मिक हृदय, दोनों की आवश्यकता है। जब पदार्थ का ज्ञान और चेतना का अनुभव एक साथ मिलते हैं, तभी मानवता की ख़ोज पूर्ण होती है

निष्कर्ष: एक नया संगम

मशहूर भौतिक विज्ञानी नील्स बोर और अर्विन श्रोडिंगर (Schrödinger) स्वयं भारतीय वेदांत दर्शन से अत्यधिक प्रभावित थे। उनका मानना था कि विज्ञान बाहरी दुनिया के नियमों को ख़ोज रहा है, जबकि अध्यात्म आंतरिक दुनिया के।

“सत्य एक ही है, वैज्ञानिक उसे बाहर ख़ोज रहे हैं और योगी उसे भीतर।”

सूचना स्रोत

डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’

अहमदाबाद गुजरात।

पाठ्य उन्नयन और प्रस्तुति

कल्पनाकार है शब्दशिल्प
चैट जीपीटी (नवाचार सहायक)
प्रस्तुतकर्ता