सार छंद
धरती पर भगवान, चिकित्सक ही कहलाते।
सेवा कर दिन रात, रोग को दूर भगाते।
देकर सही इलाज, प्राण वे रोज बचाते।
रखना जो परहेज, दवा देकर बतलाते।
नर में है भगवान, पास में जाकर देखो।
दूर हटेगा रोग, दवा तुम खाकर देखो।
मत घबराओ यार, पास भगवान खड़े हैं।
नाव लगाते पार, वैद्य जी बहुत बड़े हैं।
रचनाकार
श्योराज बम्बेरवाल ‘सेवक’
मालपुरा
प्रत्युत्तर
कलयुग के भगवान के हृदय बसा शैतान।
पहले सेवा मुख्य थी अब सोने की खान।।🙄
रचनाकार
दया शर्मा
रोला छंद
खेती करे किसान, पेट सबका ही भरता।
निपजे जब भी धान, दान कुछ पहले करता।
खेती के सब काम, ऋण लेकर निबटाता
जिसका भी सब बैंक, बना रखते हैं खाता।
मंडी में भी भाव, इन्हें जब कम ही मिलता।
देता फिर भी बेच, धान खेतों में खिलता।
कर रहे हैं हलाल, देख मुंह दलाल इनका।
बेटा खड़ा जवान, देश सीमा पर जिनका।
रचनाकार
श्योराज बम्बेरवाल ‘सेवक’
मालपुरा
प्रस्तुति