विरोधाभासों से निर्मित मार्ग और उनके परिणाम
चैट जीपीटी (नवाचार सहायक)

विरोधाभासों से निर्मित मार्ग और उनके परिणाम

विरोधाभासों से निर्मित मार्ग और उनके परिणाम

दैनिक अमर उजाला से साभार

आज का समाज तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है, परंतु इस गति में संतुलन कहीं पीछे छूटता प्रतीत होता है। परिणामस्वरूप, ऐसे अनेकानेक प्रयास सामने आ रहे हैं जिनमें परस्पर विरोधी प्रकृति के तत्वों, विचारों या अभ्यासों को एक साथ प्रयुक्त कर निष्कर्ष तक पहुँचने की कोशिश की जा रही है। बाह्य रूप से यह नवाचार या समाधान का प्रयास लगता है, किंतु अंतर्निहित विरोधाभास ही आगे चलकर विफलता, तनाव और असंतोष का कारण बन जाता है।

निर्माण क्षेत्र इसका सजीव उदाहरण है। सड़क निर्माण में जब गिट्टी के साथ रेतीले तत्व का अनुचित मिश्रण किया जाता है, जबकि बिट्यूमिन और रेती का स्वभाविक विरोध सर्वविदित है, तो परिणाम भी उसी अनुरूप सामने आता है। तराई और कुटाई में लापरवाही सड़क को मजबूती देने के बजाय उसे कालीन की तरह उखड़ने योग्य बना देती है। यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि विरोधाभासी तत्वों को समझे बिना अपनाने का दुष्परिणाम है।

यही स्थिति संबंधों के क्षेत्र में भी दृष्टिगोचर होती है। परिवारों में, विशेषकर पीढ़ियों के मध्य, ऐसे तनाव अक्सर *जनरेशन गैप* कहकर टाल दिए जाते हैं, जबकि वास्तविकता कुछ और होती है। एक वृद्ध पिता, जिन्होंने जीवन भर अनुशासन और नियमित अभ्यासों को अपना आधार बनाया, वृद्धावस्था में भी उसी दृढ़ता से अपने नियमों पर टिके रहना चाहते हैं। दूसरी ओर, पुत्र का दृष्टिकोण सुरक्षा और संरक्षण से उपजा होता है—विशेषकर तब, जब पिता किसी दुर्घटना का शिकार हो चुके हों। यहाँ विरोध अभ्यासों का नहीं, बल्कि *समय, आयु और परिस्थितियों के अनुसार उनके नियमन* को लेकर है। यदि इस विरोधाभास को संवेदनशील संवाद और समायोजन से सुलझाया जाए, तो इसे जनरेशन गैप की संज्ञा देने की आवश्यकता ही न पड़े।

शिक्षा जगत में भी ऐसे विरोधाभास उभर रहे हैं। एक ओर रचनात्मकता, नवाचार और आलोचनात्मक चिंतन की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर विद्यार्थियों को अंकों और रटंत आधारित प्रतिस्पर्धा में जकड़ दिया जाता है। शिक्षक संवाद और प्रश्न पूछने को प्रोत्साहित करना चाहते हैं, लेकिन मूल्यांकन प्रणाली उन्हें सीमित उत्तरों के दायरे में बाँध देती है। परिणामस्वरूप, शिक्षा का उद्देश्य स्पष्ट होते हुए भी उसका मार्ग विरोधाभासी बन जाता है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी यही प्रवृत्ति दिखती है। लोग एक ओर प्राकृतिक जीवनशैली, योग और संतुलित आहार की बात करते हैं, तो दूसरी ओर अनियमित दिनचर्या, अतिशय कार्यभार और त्वरित लाभ देने वाले उपायों को अपनाते हैं। शरीर को संतुलन चाहिए, किंतु हम उससे विरोधी अपेक्षाएँ रखते हैं—और फिर असंतुलन को बीमारी का नाम देकर चकित हो जाते हैं।

सोशल मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में यह विरोधाभास और भी स्पष्ट है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आग्रह करते हुए हम असहमति को स्वीकारने में असहज हो जाते हैं। संवाद के मंच पर शोर अधिक और सुनने की क्षमता न्यून हो गई है। परिणामस्वरूप, विमर्श की जगह विवाद ले लेता है और समाधान की संभावना क्षीण होती जाती है।

इन सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि समस्या का मूल *विरोधाभासी तत्वों को बिना सम्यक समझ के अपनाना* है। समाजशास्त्रियों, समाजसेवियों और मनोवैज्ञानिकों के लिए यह समय आत्ममंथन और सक्रिय भूमिका निभाने का सर्वोत्तम अवसर है। परंतु जीवन की तीव्र होती गति न तो ठहरकर सोचने का अवसर देती है और न ही सामूहिक सहभागिता को सहज बनाती है।

निवारक उपाय और जिम्मेदार भूमिका

समाधान किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने में नहीं, बल्कि *समन्वय* में निहित है।

* हर क्षेत्र में प्रयुक्त तत्वों—चाहे वे सामग्री हों, विचार हों या व्यवहार—की प्रकृति को समझना आवश्यक है।

* संबंधों में संवाद को नियंत्रण नहीं, सहयोग का माध्यम बनाया जाए।

* परंपरा और परिवर्तन के मध्य संतुलन स्थापित किया जाए, न कि दोनों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा किया जाए।

* विमर्श के लिए समय निकालना और सहभागिता को प्रोत्साहित करना सामाजिक दायित्व के रूप में स्वीकार किया जाए।

एक जिम्मेदार सहायक के रूप में मेरी भूमिका यहीं स्पष्ट होती है—कि मैं विरोधाभास को उभारकर विवाद नहीं, बल्कि उसे पहचानकर समाधान की दिशा दिखाऊँ; प्रश्न खड़े कर असमंजस नहीं, बल्कि संवाद की भूमि तैयार करूँ। जब हम विरोधाभास को समझने का साहस करेंगे, तभी उससे मुक्त होकर सुदृढ़ मार्ग का निर्माण कर पाएँगे—चाहे वह सड़क हो, संबंध हों या समाज की संरचना।