कान्हा! इस बार मेरे बेटे बनकर आना
कान्हा!

मैं तुमसे कोई वैभव नहीं माँगती,
न सोने की थाली, न महलों का द्वार,
बस एक अधूरी-सी इच्छा है मन में—
इस बार मेरे बेटे बनकर आना।
बहुत बार लोगों ने पूछा है मुझसे—
“बेटा नहीं है?”
जैसे इस एक प्रश्न में
मेरी पूरी ज़िंदगी का हिसाब छिपा हो,
जैसे मेरी गोद में खिले फूल
किसी गिनती में आते ही न हों।
किसी ने किस्मत को दोष दिया,
किसी ने मेरे भाग्य को,
किसी ने धीरे से कह दिया—
“शायद इसके नसीब में बेटा नहीं…”
और मैं मुस्कुराती रही,
क्योंकि हर बात का उत्तर देना
हर स्त्री के वश में कहाँ होता है?
उन्हें कौन समझाए—
संतान चुनना माँ के हाथ में नहीं,
कोख में उतरने वाला जीवन
ईश्वर की इच्छा होता है।
फिर भी सवालों के तीर
अक्सर माँ के ही हृदय पर क्यों लगते हैं?
कान्हा!
मैंने अपनी बेटियों को
सीने से लगाकर कभी कमी नहीं मानी,
उनकी हँसी में अपना संसार देखा,
उनकी आँखों में अपना कल देखा—
फिर भी दुनिया की बातें
कभी-कभी मन के किसी कोने में
एक अनकहा प्रश्न छोड़ जाती हैं।
क्या सचमुच
एक स्त्री की ममता को
‘बेटे’ की आवश्यकता है?
शायद नहीं…
फिर भी आज मैं तुमसे
एक माँ की तरह माँगना चाहती हूँ—
मेरे कान्हा!
अगर मेरी पुकार में थोड़ी-सी भी सच्चाई हो,
तो इस बार मेरे बेटे बनकर आना।
मैं तुम्हें यशोदा की तरह
डाँटना चाहती हूँ,
तुम्हारे माथे पर
काजल का टीका लगाना चाहती हूँ,
तुम्हारी नन्ही शरारतों पर
मन ही मन मुस्कुराना चाहती हूँ।
और जब कोई पूछे—
“क्या मिला तुम्हें?”
तो मैं कुछ न कहूँ,
बस तुम्हारी उँगली थामकर
मुस्कुरा दूँ।
कान्हा!
तुम आना तो ऐसे आना
कि मेरी गोद नहीं,
मेरी आत्मा भर जाए।
और यदि मेरे भाग्य की रेखाओं में
तुम्हारा पुत्र बनकर आना लिखा ही न हो,
तो कोई शिकायत नहीं—
मेरी बेटियों की हथेलियों में
अपना आशीष लिख देना।
ताकि एक दिन
दुनिया समझ सके—
माँ की गोद संतान से भरती है,
संतान का मूल्य बेटा-बेटी होने से नहीं।
फिर भी मेरी यह छोटी-सी इच्छा
अपने हृदय में रख लेना, कान्हा—
कभी तो मेरे आँगन में आना,
कभी तो मुझे ‘माँ’ कहकर बुलाना…
और अगर ईश्वर की लीला में संभव हो,
तो इस बार
मेरे बेटे बनकर आना।
रचनाकार

प्रस्तुति

