मुक्ति
उलझन सुलझन

मुक्ति

मैंने तुम्हें मुक्त किया

उड़ जाओ अपने आसमान की ओर,

जाओ, मैंने तुम्हें मुक्त किया।

 

मुक्त किया उस मोह से,

जिसका होना कभी नियति में था ही नहीं।

 

मुक्त किया उस बंधन से,

जिसमें व्यर्थ ही स्वयं को बाँधे फिरते रहे तुम।

 

मुक्त किया तुम्हें

तुम्हारी ही बनाई हुई कैद से।

 

पर फिर मन पूछता है—

मुक्त करने वाली मैं कौन होती हूँ?

 

मैंने तो तुम्हें

कभी बाँधा ही नहीं।

 

तुम्हें सदा बहने दिया,

उन्मुक्त सागर की तरह।

 

बंधन स्वीकार करना

तुम्हारा निर्णय था।

 

समर्थ होकर भी

तुमने किनारों को नहीं तोड़ा।

 

शायद इसी कारण

तुम सागर हो।

 

बंधना या न बंधना—

यह सदा तुम्हारी ही मर्ज़ी रही।

 

फिर भी…

 

मैंने तुम्हें मुक्त किया।

 

जानते हो क्यों?

 

क्योंकि तुम बँध गए,

तो बिखर जाओगे;

 

और यदि बहते रहे,

तो हर लहर के साथ

और भी निखर जाओगे।

— हिना

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