कलम ज़ज्बात लिखती है
हम तो कुछ नहीं बताते,
कलम ज़ज्बात लिखती है।
जो बातें होंठों तक आकर
खामोशी में ठहर जाती हैं,
वही कागज़ पर उतरकर
दिल की बात लिखती है।
हम मुस्कुराकर टाल देते हैं
कई सवाल ज़माने के,
पर कलम कहाँ मानती है,
राज़ खोल देती है अफ़साने के।
कभी आँखों की नमी लिखती है,
कभी अधूरी मुलाक़ात लिखती है,
कभी बीते हुए लम्हों की
मीठी-सी सौगात लिखती है।
हम तो बस कलम थामते हैं,
बाकी दिल खुद कहता है—
हम तो कुछ नहीं बताते,
कलम ज़ज्बात लिखती है।

— प्रमिला त्रिवेदी

