पत्र

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रक्षा बंधन पर एक भाई का ख़त अपनी बहन के नाम ❤️
मेरी प्यारी बहना,
आज लंबे अंतराल के बाद इस ख़त के माध्यम से तुझसे मुख़ातिब हो रहा हूँ। पता नहीं क्यों आज यह कागज़ और कलम भी बेचैन हैं। शायद इन्हें भी तेरी तरह मेरी ख़ामोशी को पढ़ना आ गया है। तू सोच रही होगी कि इतने वर्षों बाद अचानक ख़त क्यों? पर तू तो जानती है ना… जब भी दिल शब्दों का साथ छोड़ देता है, तब मैं ख़त का सहारा लेता हूँ।
आज भी आँखें बंद करता हूँ तो तेरी वही मासूम मुस्कान सामने आ जाती है। याद है, जब तू मेरी उँगली पकड़कर पेन थमाते हुए कहती थी—
“भैया… मुझे भी आपकी तरह लिखना सिखा दो ना…”
काश… समय भी वहीं ठहर जाता।
हम भले ही एक-दूसरे की नज़रों से दूर हो गए, लेकिन यक़ीन मान, तेरी जगह मेरे दिल में कभी किसी ने नहीं ली। हाँ, उस दिन मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई थी। न जाने कैसे मेरा धैर्य टूट गया और मैंने तेरे जीवनसाथी को कठोर शब्द कह दिए। उस एक पल के ग़ुस्से ने हमारे रिश्ते के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर दी, जिसकी कल्पना मैंने कभी नहीं की थी।
आज उस बात को पूरे तीन वर्ष हो गए हैं। दो रक्षा बंधन मेरी कलाई बिना राखी के बीत गए। लोग पूछते थे—”भाई, राखी नहीं बँधवाई?” मैं मुस्कुरा देता था… लेकिन उन्हें क्या पता था कि मेरी कलाई नहीं, मेरा मन सूना था।
रातों को चुपके से तेरी पुरानी राखियाँ निकालकर देखता था। उन्हें माथे से लगाता था और सोचता था… शायद अगले साल तू आ जाएगी। लेकिन हर बार उम्मीद हार जाती और आँखें जीत जातीं।
मेरी ज़िद आज भी वही है—अगर मेरी कलाई पर राखी सजेगी, तो सिर्फ़ मेरी बहन के हाथों से।
कल जब तेरा फ़ोन आया और तूने धीरे से कहा—
“भैया… इस बार मैं रक्षा बंधन पर आ रही हूँ…”
यक़ीन मान, उस पल लगा जैसे बरसों से बंद पड़ा मेरे घर का आँगन फिर से महक उठा हो। मेरी आँखों से बहते आँसू पहली बार शिकायत नहीं, खुशी बनकर निकले। सच कहूँ, उन आँसुओं ने मेरे मन की सारी नाराज़गी, सारा दर्द और सारी दूरियाँ बहा दीं।
बहना, रिश्ते कभी जीत-हार से नहीं चलते। रिश्ते तो झुक जाने से बचते हैं। बड़े-बुज़ुर्ग ठीक ही कहते हैं—
“उँगलियों से नाख़ून कभी अलग नहीं होते।”
बस… अब देर मत करना बिट्टू।
तेरा भैया दो वर्षों से अपनी सूनी कलाई नहीं, तेरे आने की आहट सँभालकर बैठा है। आना… और राखी बाँधते समय अगर मेरी आँखों से दो बूँद आँसू गिर जाएँ, तो उन्हें पोंछना मत। उन्हें बह जाने देना… क्योंकि कुछ दर्द आँसुओं के रास्ते ही विदा लेते हैं।
तेरे इंतज़ार में पल-पल गिनता…
सिर्फ़ तेरा…
भैया

रचनाकार

विजया डालमिया
संपादक (मेरी निहारिका) और

राष्ट्रीय संयोजिका (उलझन सुलझन)

महिला मीडिया प्रकोष्ठ

प्रस्तुति

उलझन सुलझन