ब्लैक होल और सनातन ब्रह्मांड-दृष्टि
भूमिका
विज्ञान ब्रह्मांड को प्रेक्षण, प्रयोग और गणितीय सिद्धांतों के माध्यम से समझने का प्रयास करता है, जबकि सनातन दर्शन ने सृष्टि, स्थिति और लय को चेतना, प्रकृति और काल के व्यापक संदर्भ में देखने की परंपरा विकसित की है। दोनों की भाषा और पद्धति अलग है, फिर भी कुछ अवधारणाएँ ऐसी हैं जो विचार के स्तर पर एक-दूसरे के निकट प्रतीत होती हैं। ब्लैक होल की सिंगुलैरिटी, ब्रह्मांड की उत्पत्ति-अंत की अवधारणा और सनातन दर्शन में वर्णित सृष्टि-चक्र इसी प्रकार के विमर्श का रोचक उदाहरण है।
हालाँकि, इन समानताओं को वैज्ञानिक प्रमाण या प्रत्यक्ष समतुल्यता मानना उचित नहीं होगा। इन्हें विज्ञान और अध्यात्म के बीच संवाद स्थापित करने वाले दार्शनिक संकेतों के रूप में देखना अधिक उचित है। इसी दृष्टि से ब्लैक होल और सनातन ब्रह्मांड-दृष्टि को समझने का यह प्रयास विज्ञान की जिज्ञासा और अध्यात्म की अंतर्दृष्टि—दोनों को साथ रखता है।
ब्लैक होल और सनातन ब्रह्मांड-दृष्टि
विज्ञान के आधुनिक सिद्धांतों और प्राचीन सनातन दर्शन के बीच कई ऐसे रोचक संदर्भ मिलते हैं, जो हमें ब्रह्मांड को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखने के लिए प्रेरित करते हैं। विज्ञान जहाँ ब्रह्मांडीय घटनाओं को प्रेक्षण, गणित और भौतिक नियमों के आधार पर समझता है, वहीं सनातन दर्शन सृष्टि, स्थिति और लय को व्यापक दार्शनिक तथा आध्यात्मिक संदर्भ में देखता है।
इसी क्रम में ब्लैक होल और सिंगुलैरिटी तथा सनातन परंपरा में वर्णित प्रलय और सृष्टि-चक्र के बीच कुछ वैचारिक समानताएँ ध्यान आकर्षित करती हैं। इन समानताओं को वैज्ञानिक समानता मानने के बजाय एक दार्शनिक संवाद के रूप में समझना अधिक उचित होगा।
वैज्ञानिक संदर्भ : ब्लैक होल और सिंगुलैरिटी
खगोल भौतिकी के अनुसार ब्लैक होल अंतरिक्ष का ऐसा अत्यंत सघन क्षेत्र है, जिसके घटना-क्षितिज (Event Horizon) के भीतर से प्रकाश तक बाहर नहीं निकल सकता। सामान्य सापेक्षता के अनुसार इसके केंद्र में सिंगुलैरिटी की भविष्यवाणी की जाती है, जहाँ पदार्थ की सघनता और अंतरिक्ष-समय की वक्रता अत्यधिक हो जाती है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह वह सीमा भी है जहाँ हमारी वर्तमान भौतिकी पर्याप्त उत्तर देने में असमर्थ हो जाती है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। सिंगुलैरिटी को वास्तव में ‘अनंत सूक्ष्म बिंदु’ या ‘अनंत घनत्व वाला वास्तविक पदार्थ-बिंदु’ मान लेना अभी अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं है। आधुनिक वैज्ञानिक समझ में यह संभव है कि सिंगुलैरिटी का गणितीय परिणाम इस बात का संकेत हो कि सामान्य सापेक्षता को क्वांटम गुरुत्व के साथ जोड़ने वाली अधिक पूर्ण भौतिकी की आवश्यकता है।
अर्थात् ब्लैक होल हमें ब्रह्मांड के उस क्षेत्र की सीमा तक ले जाता है, जहाँ वर्तमान वैज्ञानिक ज्ञान के सामने अभी भी अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं।
सनातन दृष्टि : सृष्टि, स्थिति और प्रलय
सनातन दर्शन में ब्रह्मांड को केवल एक बार उत्पन्न होकर समाप्त हो जाने वाली व्यवस्था के रूप में देखना आवश्यक नहीं है। अनेक हिंदू दार्शनिक और पौराणिक परंपराओं में सृष्टि, स्थिति और लय को चक्रीय प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
कल्प, महायुग और प्रलय जैसी अवधारणाएँ इसी व्यापक काल-दृष्टि का हिस्सा हैं। यहाँ ‘प्रलय’ को केवल पूर्ण विनाश के अर्थ में देखना भी पर्याप्त नहीं है; यह एक ऐसी अवस्था का दार्शनिक संकेत है जिसमें व्यक्त जगत पुनः अव्यक्त अवस्था में विलीन होता है और आगे किसी नए सृजन की संभावना बनती है।
यही विचार सनातन चिंतन में अंत और आरंभ के परस्पर संबंध को रेखांकित करता है—अर्थात् अंत अपने भीतर किसी नए आरंभ की संभावना भी धारण कर सकता है।
प्रलय और ब्लैक होल : समानता कहाँ तक?
ब्लैक होल और प्रलय को सीधे-सीधे एक ही घटना कहना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। फिर भी दोनों के बीच एक दार्शनिक समानता पर विचार किया जा सकता है।
ब्लैक होल में अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण पदार्थ और प्रकाश घटना-क्षितिज के भीतर चले जाते हैं और बाहरी पर्यवेक्षक के लिए उस क्षेत्र की जानकारी अत्यंत सीमित हो जाती है। दूसरी ओर, सनातन दर्शन में प्रलय व्यक्त सृष्टि के अव्यक्त में लय का प्रतीक है।
इसलिए दोनों को ‘एक ही घटना’ कहने के बजाय यह कहा जा सकता है कि दोनों अवधारणाएँ हमें उस सीमा के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करती हैं जहाँ हमारी सामान्य समझ समाप्त होती दिखाई देती है।
क्या ब्लैक होल से बिग बैंग का जन्म होता है?
यहाँ वैज्ञानिक सावधानी सबसे अधिक आवश्यक है।
यह विचार आकर्षक अवश्य है कि किसी ब्लैक होल की सिंगुलैरिटी से किसी नए ब्रह्मांड का जन्म हो सकता है, और कुछ सैद्धांतिक मॉडलों में ऐसे विचारों पर चर्चा भी हुई है। लेकिन वर्तमान वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर यह कहना सही नहीं है कि ब्लैक होल या उसकी सिंगुलैरिटी से ही हमारा बिग बैंग हुआ था।
NASA के अनुसार बिग बैंग को ब्लैक होल नहीं माना जाता। दोनों की सिंगुलैरिटी संबंधी गणितीय समस्याएँ अलग संदर्भों में आती हैं और उनके बीच सीधा भौतिक संबंध स्थापित नहीं हुआ है।
इसलिए यहाँ ‘समानता’ को एक दार्शनिक संभावना या सैद्धांतिक कल्पना के रूप में रखना उचित है, वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं।
अंत में आरंभ की संभावना
सनातन दर्शन का सृष्टि-चक्र हमें यह विचार देता है कि अस्तित्व को केवल आरंभ और अंत की सीधी रेखा में नहीं, बल्कि निरंतर परिवर्तन और चक्र के रूप में भी देखा जा सकता है। आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान भी हमें यह बताता है कि ब्रह्मांड स्थिर और अपरिवर्तनशील नहीं है; वह गतिशील है और उसके उद्गम, विकास तथा भविष्य को लेकर वैज्ञानिक अनुसंधान लगातार जारी है।
यहीं विज्ञान और अध्यात्म के बीच एक सुंदर संवाद की संभावना दिखाई देती है।
यह कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि प्राचीन ऋषियों ने ब्लैक होल या सिंगुलैरिटी को उसी अर्थ में जान लिया था, जिस अर्थ में आधुनिक खगोल भौतिकी उन्हें समझती है। इसी प्रकार यह भी उचित नहीं कि सनातन दर्शन की प्रत्येक अवधारणा को किसी आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांत का प्राचीन रूप घोषित कर दिया जाए।
लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि मानव सभ्यता ने अलग-अलग ज्ञान-परंपराओं में ब्रह्मांड के आरंभ, अंत, परिवर्तन और अस्तित्व के मूल प्रश्नों पर गंभीर चिंतन किया है।
विज्ञान इन प्रश्नों के उत्तर प्रेक्षण, प्रयोग और गणितीय समीकरणों के माध्यम से खोजता है, जबकि अध्यात्म उन्हें चेतना, अनुभव और दार्शनिक चिंतन के माध्यम से देखने का प्रयास करता है। दोनों की पद्धतियाँ अलग हैं, लेकिन जिज्ञासा का केंद्र कहीं न कहीं समान है—यह ब्रह्मांड क्या है, इसका स्वरूप क्या है और इसके पीछे कौन-से मूल नियम कार्यरत हैं?
शायद इसी अर्थ में ब्लैक होल और सनातन ब्रह्मांड-दृष्टि का संवाद महत्वपूर्ण हो जाता है। यह हमें किसी निष्कर्ष को थोपने के बजाय प्रश्न पूछना सिखाता है—और ज्ञान की यात्रा अक्सर सही उत्तर से पहले सही प्रश्न से ही शुरू होती है।
सृजक

स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन
अहमदाबाद महिला प्रकोष्ठ
प्रस्तुति


