कविता
उलझन सुलझन

कविता

मैंने सेवा चुन ली

एक संवेदनशील मन की पुकार

सब बाज़ार में खड़े हो,
माया का मोल लगा रहे थे,
कोई सोना चुन रहा था,
तो कोई हीरे सजा रहे थे।

हर चेहरे पर एक चाहत थी,
हर आँख में अपनी होड़ थी,
किसके पास कितना है आखिर—
बस इतनी-सी बात बड़ी थी।

मैं भी उस भीड़ में खड़ी थी,
हाथ भले ही खाली था,
पर मन में जाने क्यों
एक अजीब-सा उजियारा था।

सबने हँसकर पूछा मुझसे—
“तू क्या चुनेगी पगली?”
मैंने आँखें बंद कीं,
और अपने मन की सुन ली।

सब माया चुन रहे थे,                                                  मैंने सेवा चुन ली,                                                  जहाँ दुनिया ने कीमत देखी,                                       मैंने इंसानियत चुन ली।

मैंने देखा एक बूढ़ी आँखों में
अपनों का इंतज़ार पलता है,
एक बच्चे की छोटी-सी हँसी में
जैसे पूरा संसार मचलता है।

किसी के घर चूल्हा बुझा था,
किसी के तन पर कपड़े कम थे,
किसी के हिस्से में आँसू थे,
किसी के सपने भी नम थे।

तब मन ने धीरे से पूछा—
“क्या इनसे भी कोई रिश्ता है?”
मैंने कहा—
“रिश्ता खून से नहीं,
कभी-कभी दर्द से बनता है।”

माया बोली—
“मुझे पा लो, दुनिया तुम्हें बड़ा मानेगी।”
सेवा बोली—
“किसी के काम आ जाओ,
तुम्हारी ज़िंदगी खुद तुम्हें पहचानेगी।”

माया हाथों में ठहरती नहीं,
आज है तो कल चली जाती है,
लेकिन सेवा की एक छोटी-सी लौ
किसी के जीवन में रोशनी बन जाती है।

इसलिए मैंने महल नहीं चुना,
ना हीरे-मोती का सपना चुना,
जहाँ सबने अपना नाम लिखा,
मैंने वहाँ किसी और का दर्द चुना।

मैंने अपनी खुशियों में से
थोड़ी खुशियाँ बाँटना सीख लिया,
किसी की आँख का आँसू देखकर
अपना मन भिगाना सीख लिया।

अब ना मुझे चमक चाहिए,
ना किसी से कोई होड़ है,
मेरी झोली खाली ही सही,
पर दिल में इंसानियत का करोड़ है।

मैंने जाना—
जीवन केवल अपने लिए जीना नहीं,
किसी के अँधेरे में
एक दीपक बन जाना भी जीवन है।

इसलिए आज गर्व से कहती हूँ—

सब माया चुन रहे थे, मैंने सेवा चुन ली,
जिसे दुनिया ने कमजोरी समझा,
मैंने वही संवेदना चुन ली।

और अगर फिर कभी
मुझे जीवन के उस बाज़ार में खड़ा किया गया,
तो मैं फिर वही चुनूँगी—
जो किसी चेहरे पर मुस्कान लाए,
जो किसी भूखे को रोटी दे,
जो किसी टूटे मन को सहारा दे।

क्योंकि धन से भरी झोली
सिर्फ घर भर सकती है,
पर सेवा से भरा हृदय
पूरी दुनिया को अपना बना सकता है।

सरोज प्रसाद राय
उलझन सुलझन, स्थानीय संपादिका
जयपुर महिला प्रकोष्ठ

प्रस्तुति

उलझन सुलझन