कविता

कविता

हिंदी

बड़े भाग्य मानुष तन पाया,
हिंदुस्तान में बसेरा भाया।

पढ़कर हिंदी,लिखकर हिंदी,
भाषा का है मान बढ़ाया।

हिंदी को वट वृक्ष बनाया,
चहुँ दिशा में है फैलाया।

जड़ों को मजबूत बनाया,
सोये संस्कारों को जगाया ।

रहे हम चाहे जहाँ कहीं भी,
हिंदी को ही हमने अपनाया।

दुनिया में हिंदी की ध्वजा को,
घर-घर तक है पहुँचाया।

हिंदी की बिंदी ने मान बढ़ाया,
भारतीयों की पहचान बनाया।

सुलोचना धनावत

स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन

नागपुर महिला प्रकोष्ठ
14-9-2026