जब मैं थी ही नहीं — 1980 से आज तक
कभी मन करता है
समय की घड़ी को उलटा घुमा दूँ,
आज की चमकती स्क्रीन से निकलकर
सन् 1980 की उस सुबह में जा बैठूँ,
जहाँ मैं थी ही नहीं—
फिर भी कहीं न कहीं
मेरे आने की एक अनदेखी कहानी
समय के पन्नों में लिखी जा रही थी।
मैं देखना चाहती हूँ
वह घर,
जिसकी दीवारों ने मुझे कभी देखा नहीं,
वह आँगन
जिसमें मेरे कदमों की आहट नहीं थी,
वह चौखट
जिसे पार करके मैं वर्षों बाद
अपने ही बचपन में प्रवेश करने वाली थी।
मैं देखना चाहती हूँ माँ को—
माँ बनने से पहले,
उनकी आँखों में छिपे वे सपने
जिनमें शायद मेरा कोई चेहरा नहीं था,
फिर भी मातृत्व की कोई अनकही रोशनी
उनके भीतर धीरे-धीरे जल रही थी।
देखना चाहती हूँ पिता को—
मेरे पिता बनने से पहले,
उनके कंधों पर रखी जिम्मेदारियाँ,
उनकी हथेलियों की मेहनत,
उनकी आँखों की थकान,
और वह मुस्कान
जिसे देखकर मैं वर्षों बाद
उन्हें अपना सबसे मजबूत सहारा समझूँगी।
काश!
मैं उस समय में जाकर
किसी को अपना नाम बताए बिना
बस एक कोने में बैठ जाऊँ—
देखूँ कि लोग कैसे जीते थे,
कैसे बिना हर पल तस्वीर खींचे
पलों को याद रखते थे।
न हर खुशी को
दुनिया के सामने साबित करना था,
न हर दुख को
कुछ सेकंड की कहानी बनाना था।
चिट्ठियाँ थीं—
धीरे चलती थीं,
पर भावनाएँ तेज़ पहुँचती थीं।
घड़ियाँ थीं—
पर समय के पास
इतनी जल्दी नहीं थी।
रेडियो की आवाज़ में
शाम उतरती थी,
आँगन में चारपाइयाँ बिछती थीं,
और आसमान को देखते हुए
लोग मौसम ही नहीं,
एक-दूसरे का मन भी पढ़ लेते थे।
फिर समय आगे बढ़ा।
कागज़ से स्क्रीन तक,
चिट्ठियों से संदेशों तक,
आँगन की बातचीत से
हज़ारों चेहरों की भीड़ तक।
और आज—
हर दिन एक नया ट्रेंड है।
आज मुस्कुराने का भी ट्रेंड है,
आज दुख छिपाने का भी ट्रेंड है,
आज खुद को बदलने का ट्रेंड है,
आज यह बताने का ट्रेंड है
कि “मुझे किसी की परवाह नहीं।”
कुछ सेकंड की वीडियो में
पूरी जिंदगी सजा दी जाती है—
फिर वही जिंदगी
स्क्रीन बंद होते ही
अपने असली सवाल लेकर
हमारे सामने खड़ी हो जाती है।
मैं सोचती हूँ—
क्या ट्रेंड ही जीवन है?
या जीवन वह है
जो ट्रेंड खत्म होने के बाद भी
हमारे भीतर बचा रहता है?
आज चेहरे पर मुस्कान लगाना आसान है,
पर मन की थकान छिपाना
हर किसी के लिए आसान नहीं।
आज लोग कहते हैं—
“अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जियो।”
पर असली जिंदगी पूछती है—
“और उन रिश्तों का क्या,
जिन्हें निभाते हुए
तुमने खुद को कहीं पीछे छोड़ दिया?”
1980 में शायद
लोगों के पास दिखाने को कम था,
पर जीने को बहुत कुछ था।
आज हमारे पास
दिखाने को बहुत कुछ है—
पर कभी-कभी
अपने भीतर लौटने का समय ही नहीं।
वहाँ तस्वीरें कम थीं,
इसलिए शायद यादें अधिक थीं।
यहाँ तस्वीरें हजारों हैं,
फिर भी कुछ चेहरे
स्मृति में धुंधले पड़ जाते हैं।
वहाँ इंतज़ार लंबा था,
पर मुलाकात की कीमत थी।
आज संदेश तुरंत पहुँचता है,
फिर भी कई बार
दिल तक पहुँचने में
पूरी उम्र लग जाती है।
मैं 1980 को इसलिए नहीं चाहती
कि वह समय पूर्ण था—
हर युग की अपनी कठिनाइयाँ थीं,
अपनी सीमाएँ थीं,
अपनी अधूरी कहानियाँ थीं।
मैं तो बस
उस समय को छूना चाहती हूँ
जहाँ मेरा अस्तित्व अभी
किसी की कहानी का हिस्सा नहीं था।
जहाँ मेरी माँ की गोद
अभी खाली थी,
मेरे पिता की उँगली
अभी किसी छोटी उँगली को
थामने की प्रतीक्षा में नहीं थी।
मैं वहाँ जाकर
अपने जन्म से पहले की दुनिया को
एक बार आँख भरकर देखना चाहती हूँ—
और फिर लौटकर
आज की इस भागती हुई दुनिया से कहना चाहती हूँ—
“ट्रेंड बदलते रहेंगे,
फैशन बदलते रहेंगे,
चेहरे बदलेंगे,
स्क्रीन बदलेंगी,
समय अपनी चाल बदलता रहेगा;
पर जो जीवन सच में जिया गया,
उसकी कोई जगह
किसी ट्रेंड से नहीं छीनी जा सकती।”
क्योंकि अंत में
हमारे पास वायरल होने की कहानी नहीं,
जी लेने की कहानी बचती है।
कुछ पल पोस्ट नहीं होते,
बस भीतर बस जाते हैं।
कुछ रिश्ते
तस्वीरों में नहीं आते,
फिर भी पूरी जिंदगी
हमारे साथ चलते हैं।
और कुछ समय—
जैसे मेरा वह 1980—
जिसे मैंने देखा ही नहीं,
फिर भी जाने क्यों
आज भी लगता है
जैसे उसकी किसी पुरानी खिड़की से
कोई मुझे पुकार रहा हो—
“तुम बहुत देर से आई हो,
पर तुम्हारी कहानी
हमारे समय से ही शुरू हो गई थी…”
सृजक
सरोज प्रसाद राय
प्रस्तुति

