कविता
उलझन सुलझन

कविता

फ्रिज़ की कहानी

आधा कटा खीरा, घीया, टमाटर,
पड़े मुरझाए आपस में लिपटकर,
हो गए बासी, कोई खाना न चाहे अब,
जब थे ताज़े, तब चाहते थे हमें सब।

रख दिया लाकर ठंडे डिब्बे में,
कब नंबर आएगा बाहर अब निकलने में,
पास पड़ी कटोरी में बची काली दाल,
कल ज़रूर कड़ाही में करेंगे गर्म लगाए आस।

दूसरी शेल्फ पर पड़े डब्बे मिठाई के,
सब्जियों पर ज़ोर ज़ोर मुस्कुराए,
उनके वी.आई. पी. स्पेशल डब्बे,
काँपती सब्ज़ियाँ ज़ोर ज़ोर रोए।

उसकी निचली शेल्फ पर थी सूखी पुदीना, धनिया,
कहती बहन! मैं समझ सकती हूँ दर्द तेरा,
कल तक किया था याद, कहाँ है धनिया,
आज हुई हरी से पीली तो दिखा दिया कोना!

अब तो हुए नींबू भी पुराने पड़े-पड़े,
कौन अब बनाए नींबू पानी पुदीना डाल के,
अब सूखी परत और मुरझाई पत्तियाँ,
डस्टबिन की रास्ता सोचकर घबराएँ।

सबसे ऊपर रानी एलिज़ाबेथ आइसक्रीम,
अत्यंत ठंडी, बर्फीली निवास पर बैठी,
सब को चुप रहने की सलाह देते हुए,
खुद आराम से आराम फरमाए।

जया सूद
(कवयित्री/कहानीकार)

चंडीगढ़

प्रस्तुति

उलझन सुलझन