फूल वालों की सैर
उलझन सुलझन

फूल वालों की सैर

फूल वालों की सैर

(तहजीब और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक)

यह एक वार्षिक उत्सव है जो दिल्ली में मनाया जाता है और हिंदू-मुस्लिम समुदाय मिलकर फूलों की चादर और पंखे अर्पित करते हैं! यह उत्सव महरौली क्षेत्र में मनाया जाता है.
इसकी अवधि तकरीबन एक सप्ताह की होती है.
मुख्य गतिविधि – हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर फूलों की चादर और पंखे चढ़ाते हैं.
विशेषता – यह उत्सव दिल्ली की गंगा-जमुनी तहजीब और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है. इस दौरान रंगारंग झांकियां, कव्वालियां, लोक संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं.
भागदौड़ भरी जिंदगी में आजकल जिनकी लोकप्रियता कम हो गई है बहुत लोगों को तो उसका नाम भी नहीं मालूम.
फूल वालों की सैर का महत्व सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के मूल में देखा जा सकता है जो उसे बढ़ावा देता है. भारत के धार्मिक संस्कृतियों का मिश्रण है और अपनी आध्यात्मिकता और मान्यताओं के लिए जाना जाता है.
यह त्यौहार सिराज़-उद दीन ज़फर के शासनकाल के दौरान अपने चरम पर पहुंच गया था, जिसे अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के नाम से जाना जाता है. उनके शासन काल में 1857 में भी फूल वालों की सैर मनाने गए थे जब दिल्ली अंग्रेजों की घेराबंदी में थी. यह मुगलों के
अंतिम फूल वालों की सैर थी.
यह त्यौहार सांप्रदायिक भावना का छिपा हुआ रत्न
फूल वालों की सैर है.
ऐसा मानना है कुतुब मीनार के पास योगमाया का मंदिर है जिसे हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है और वहाँ पर फूलों के पंखे चढ़ाए जाते हैं. कुतुबुद्दीन अख्तियार काकी की दरगाह पर फूलों की चादर और पंखे चढ़ाए जाते हैं.
ऐसे त्योहारों को भी बढ़ावा देना चाहिए जो हमारे देश की आपसी सद्भाव प्रेम को बढ़ावा दे.

रचनाकार

गीता ठाकुर

स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन

दिल्ली महिला प्रकोष्ठ

प्रस्तुति