ईश्वर को आखिरी उम्मीद नहीं, पहला भरोसा बनाइए
आचार्य निखिल जी महाराज जब कहते हैं—
“ईश्वर को आखिरी उम्मीद नहीं, अपितु पहला भरोसा बनायें।”
तब उनकी वाणी में केवल धार्मिक आस्था का आग्रह नहीं, बल्कि जीवन के प्रति एक गहरी आत्मिक दृष्टि दिखाई देती है। यह कथन मनुष्य को उस मानसिकता से बाहर निकालने का प्रयास है जिसमें वह अपनी सारी शक्तियाँ समाप्त हो जाने के बाद ईश्वर को याद करता है। गुरुजी का संकेत है कि ईश्वर केवल संकट के समय पुकारे जाने वाला नाम नहीं, बल्कि जीवन की प्रत्येक यात्रा में साथ चलने वाला विश्वास होना चाहिए।
उनकी मनःस्थिति को समझें तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे मनुष्य की उस बेचैनी को अनुभव कर रहे हैं, जिसमें व्यक्ति पहले संसार के सभी दरवाजे खटखटाता है, अपनी बुद्धि, संबंधों, धन और सामर्थ्य पर निर्भर करता है और जब कहीं से सहायता नहीं मिलती, तब अंततः प्रभु की शरण में आता है। आचार्य निखिल इस क्रम को बदलने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर को अंतिम विकल्प मत बनाओ; अपने जीवन की शुरुआत ही उस भरोसे से करो कि तुम्हारे प्रयासों के पीछे एक व्यापक शक्ति का संबल मौजूद है।
गुरुजी मानो कह रहे हों— “बंदे, जब सब कुछ तुम्हारे अनुसार हो रहा हो, तब भी प्रभु को याद रखो और जब कुछ भी तुम्हारे अनुसार न हो रहा हो, तब भी उसी पर विश्वास रखो। यदि सुख में ईश्वर तुम्हारा साथी है, तभी दुःख में उसकी शरण वास्तविक होगी। संकट आने के बाद विश्वास करना सरल हो सकता है, लेकिन बिना संकट के भी विश्वास बनाए रखना ही सच्ची श्रद्धा है।”
यहाँ ईश्वर पर भरोसा करने का अर्थ कर्म छोड़ देना नहीं है। आचार्य निखिल की दृष्टि में प्रभु पर विश्वास मनुष्य को निष्क्रिय नहीं, बल्कि अधिक साहसी बनाता है। जब व्यक्ति यह अनुभव करता है कि वह अकेला नहीं है, तब वह कठिन परिस्थितियों का सामना अधिक धैर्य से कर सकता है। वह अपने प्रयास करता है, निर्णय लेता है, गलतियों से सीखता है, लेकिन परिणाम को लेकर भीतर से पूरी तरह टूटता नहीं।
वे एक दृष्टांत सुनाते हैं। एक बालक अपने पिता के साथ नदी पार कर रहा था। नाव बीच धारा में पहुँची तो तेज लहरें उठने लगीं। बालक घबरा गया और पिता का हाथ कसकर पकड़ लिया। पिता ने कहा— “डर मत, मैं हूँ।” बालक ने पूछा— “लेकिन यदि नाव डूब गई तो?” पिता मुस्कुराए और बोले— “तुम्हारा काम मेरे साथ रहना और विश्वास रखना है; नाव चलाना मेरा काम है।”
गुरुजी समझाते हैं— “मनुष्य जीवन की नाव में बैठा है। उसे अपने हिस्से का प्रयास करना है, लेकिन हर लहर को अपने अकेले दम पर नियंत्रित करने की जिद नहीं करनी चाहिए। भरोसा भय को समाप्त नहीं करता, पर भय के बीच चलने की शक्ति अवश्य देता है।”
फिर वे एक और दृष्टांत देते हैं। एक किसान प्रतिवर्ष खेत में बीज बोता था। वह मिट्टी तैयार करता, पानी देता और पौधों की रक्षा करता। एक बार वर्षा देर से हुई तो वह बहुत चिंतित हो गया। उसने एक वृद्ध किसान से कहा— “मैंने अपना सब कुछ कर दिया, लेकिन अब परिणाम मेरे हाथ में नहीं है।”
वृद्ध ने कहा— “यही तो खेती का सत्य है। किसान का धर्म बीज बोना और खेत की देखभाल करना है; वर्षा का आना उसके अधिकार में नहीं। लेकिन यदि वह हर बार बीज बोने से पहले ही वर्षा की चिंता करने लगे, तो खेती कैसे होगी?”
आचार्य निखिल कहते हैं— “ईश्वर पर पहला भरोसा मनुष्य को इसी प्रकार कर्मशील बनाता है। वह भविष्य की अनिश्चितताओं से भयभीत होकर बैठता नहीं, बल्कि विश्वास के साथ अपना वर्तमान श्रेष्ठ बनाने में लग जाता है।”
उनकी इस वाणी में एक और महत्वपूर्ण भाव छिपा है— ईश्वर को केवल मांगने का माध्यम न बनाना। अक्सर मनुष्य प्रार्थना को इच्छाओं की सूची बना देता है। वह कहता है, “प्रभु, यह दे दो, वह बचा लो, यह काम करा दो।” लेकिन गुरुजी का संकेत इससे आगे जाने का है। वे चाहते हैं कि मनुष्य ईश्वर से केवल परिणाम न माँगे, बल्कि सही दिशा, विवेक, धैर्य और सद्बुद्धि भी माँगे।
वे मानो कहते हैं— “बंदे, ईश्वर को अपने आदेशों का पालन करने वाला मत समझो। उसे अपना मार्गदर्शक बनाओ। जब तुम किसी निर्णय के सामने खड़े हो, तब पहले अपने भीतर सत्य और विवेक की आवाज सुनो। जब कठिनाई आए, तब घबराकर गलत रास्ता मत चुनो। प्रभु पर भरोसा तुम्हें भीतर से स्थिर करेगा।”
इस कथन का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि यह मनुष्य को आश्रित नहीं, बल्कि आंतरिक रूप से समर्थ बनाता है। ईश्वर को पहला भरोसा बनाने वाला व्यक्ति संसार से भागता नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए भी अपनी शांति को केवल बाहरी परिस्थितियों के हवाले नहीं करता। वह जानता है कि संबंध बदल सकते हैं, परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, योजनाएँ असफल हो सकती हैं, लेकिन विश्वास का आधार भीतर बना रह सकता है।
आचार्य निखिल जी महाराज की मनःस्थिति में यहाँ गहरा समर्पण और आत्मिक संतुलन दिखाई देता है। वे शायद यह कहना चाहते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या संकट नहीं, बल्कि संकट के समय अकेले पड़ जाने का भय है। यदि जीवन की शुरुआत से ही ईश्वर को अपना भरोसा बना लिया जाए, तो कठिन समय में मनुष्य टूटने के बजाय भीतर से संभलना सीखता है।
अंततः गुरुजी की वाणी हमें यह स्मरण कराती है कि ईश्वर को केवल अंतिम क्षणों का सहारा बनाना पर्याप्त नहीं। जीवन के प्रत्येक निर्णय, प्रत्येक प्रयास और प्रत्येक अनिश्चितता में उस परम शक्ति के प्रति विश्वास बनाए रखना ही सच्ची आध्यात्मिक यात्रा है।
वे मानो अंत में कहते हैं— “बंदे, प्रभु को तब मत पुकारो जब दुनिया तुम्हें छोड़ दे; उसे तब भी याद रखो जब दुनिया तुम्हारे साथ खड़ी हो। संकट में मिली श्रद्धा तुम्हें संभाल सकती है, लेकिन जीवन भर का भरोसा तुम्हें बदल सकता है। अपने कर्म करो, अपनी जिम्मेदारियाँ निभाओ, अपने पुरुषार्थ को जागृत रखो— पर हृदय में यह विश्वास सदा जीवित रखो कि तुम अकेले नहीं हो।”
ईश्वर को आखिरी उम्मीद नहीं, पहला भरोसा बनाना ही उस आंतरिक शक्ति का आरंभ है, जहाँ मनुष्य परिस्थितियों से नहीं, विश्वास से संचालित होकर जीवन जीना सीखता है।
एक दृष्टि में

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