उलझन सुलझन

भक्ति

जब मन में तुम उतर आते हो

घंटियों की गूँज में ही

भक्ति का स्वर नहीं होता,

कभी मौन बैठे मन में भी

तेरा नाम उतर आता है।

 

फूल चढ़ाए तेरे चरणों में,

पर मन को कब चढ़ा पाई,

दीप जलाए मंदिर में,

पर भीतर की लौ कब जलाई?

 

मैंने तुझे मंदिर में खोजा,

तू किसी भूखे की आँखों में मिला,

मैंने तुझे मूर्ति में देखा,

तू किसी रोते चेहरे की

मुस्कान बनकर मिला।

 

अब तुझसे कुछ माँगना नहीं,

बस इतनी कृपा बनाए रखना—

मेरे हाथ किसी का दर्द बाँटें,

मेरी वाणी किसी को न दुखाए,

और मेरे कर्मों से

किसी टूटे मन को सहारा मिले।

 

क्योंकि अब समझ आया—

भक्ति माथा झुकाने का नाम नहीं,

भक्ति तो अपने भीतर के

‘मैं’ को मिटाने का नाम है।

 

जब हर प्राणी में

तेरी ही छवि दिखाई देने लगे,

जब पराए का दर्द भी

अपना-सा महसूस होने लगे,

तभी समझूँगी प्रभु—

मेरी पूजा पूरी हुई,

और मेरी भक्ति

तुम तक पहुँच गई।

रचनाकार

सरोज प्रसाद राय