परमानंद की खोज

सुख में सुखी, दुःख में दुःखी,
यह तो जग की रीत है।
हर परिस्थिति में आनंदित रहना,
शायद यही जीवन की प्रीत है।
आनंद का कोई विलोम नहीं,
यह मन की कोई क्षणिक चाह नहीं।
परमानंद तो भीतर बसता है,
यह इंद्रियों का दिया हुआ उपहार नहीं।
संसार के आयोजनों में उलझकर,
हम स्वयं से दूर चले जाते हैं।
बाहर की खुशियों को खोजते-खोजते,
भीतर का आनंद भूल जाते हैं।
जब चेतना लौटती है स्वयं की ओर,
जब सत्य की खोज में मन रम जाता है,
जब बाहरी आकर्षण पीछे छूटते हैं,
तब अंतर्मन का द्वार खुल जाता है।
न सुख में बँधना, न दुःख से हारना,
न हर पल कुछ पाने की चाह रखना।
बस अपने भीतर सत्य को जानना,
और उसी में सहज होकर रहना।
परमानंद कोई क्षणिक अनुभूति नहीं,
न ही संसार से मिलने वाली सौगात है।
यह स्वयं को जानने की यात्रा है,
जहाँ आत्मिक शांति ही आनंद का आधार है।
सृजक

रेणु लूथरा
प्रस्तुति

