सुनिता जी की कलमकारी

शिक्षा का बंटाधार

आजकल तो शिक्षा का हो रहा बंटाधार
राजनीति के दुष्चक्र में शिक्षा को भी फांस लिया
आए दिन नई नए खेल खेले जा रहे
क्या-क्या नहीं हो रहा स्कूलों में
ये उत्सव, वो गतिविधि
खेल, रैली, प्रदर्शनी और भी बहुत कुछ
नहीं हो रही तो बस केवल पढ़ाई
परीक्षाएं एकदम नजदीक आ रहीं
ऊपर से सरकार को कई नवाचारों की सूझ रही
परिणाम कम आने पर फिर शिक्षकों से नोटिस में बात की जाएगी
करना चाहते हैं बहुत कुछ अभी
पर नीतियाँ नहीं चाह रहीं
किसी को अपने सिलेबस की चिंता सता रही
तो किसी को रिविज़न की चिंता खा रही
पर विभागीय नीतियों में ये सब धराशाई हो रहीं
कभी विकसित भारत के नाम पर पूरा सप्ताह लील लिया जाता
तो कभी और किसी नाम के
जैसे स्कूल शिक्षा के नहीं, इन्हीं कामों के लिए बने हों
शिक्षक और बच्चे खुद असमंजस में हैं
कभी पोस्टर बनाओ, कभी निबन्ध लिखवाओ
कभी रंगोली सजाओ, कभी डांस करवाओ
कभी वहाँ ले जाओ, कभी यहाँ ले जाओ
केवल एक या दो दिन की बात नहीं
पूरे साल भर चलता है यह दोहरापन
फिर शिक्षा में गुणवत्ता की बात करते हैं
कभी-कभी शिक्षक ही भूल जाता है
कि उसका मुख्य कार्य क्या है
केवल आयोजन तक ही सीमित नहीं
इन सबका फ़ोटो खींचो, वीडियो भी बनाओ
आईडी पर अपलोड करो
कभी साइट तो कभी नेटवर्क की समस्या और तनाव में जी रहा है शिक्षक
फ़िर सोचता है हमारा मुख्य ध्येय तो हमसे छीन लिया
बाकी सब करना पड़ रहा है
आज बोर्ड की कक्षाओं को बुलाया गया
टेस्ट होंगे, बोर्ड परीक्षा परिणाम उन्नयन के
बच्चे आए भी लेकिन ………
पढ़ाई नहीं कर सके
स्कूल में टूर्नामेंट का समापन था
साउंड खूब गूंज रहा था
कार्यक्रम रंगारंग चल रहा था
बच्चे कमरों में बंद थे
कोलाहल से परेशान भी थे
न तो सेल्फ स्टडी कर पा रहे, न टेस्ट दे पा रहे
इतने शोर शराबे में संभव भी नहीं
अभी तो एक और कार्यक्रम में शिरकत करना है
जिसका शायद उनकी पढ़ाई से दूर-दूर भी सम्बन्ध नहीं
लेकिन जाना है, आला कमान का ऑर्डर है
और क्या नीतियाँ लिखूँ, ऐसी नीतियां बनाई जा रहीं
जिससे शिक्षा और गर्त में जा रही
सरकारी स्कूल हर रैली, आयोजन का हिस्सा होता है
जिससे वो शिक्षा में पिछड़ता जा रहा है
इसका दुःख एक सरकारी शिक्षक से बेहतर कौन समझ सकता है

जागो, अब जागो

सोच बदलो, समय बदलो,
बदल रहा संसार,
आँखें खोलो, सच को देखो,
मत रहो अब लाचार।

अंधविश्वास की बेड़ियों को,
आज हमें है तोड़ना,
झूठे भ्रम और झूठी बातों से,
नाता अपना छोड़ना।

शिक्षा केवल डिग्री नहीं है,
जीवन की पहचान,
सही-गलत को समझ सके जो,
वही सच्चा इंसान।

नारी का सम्मान हो हर घर में,
बेटी को मिले अधिकार,
भेदभाव की दीवार गिराकर,
बनाएँ सुंदर संसार।

जल, जंगल और धरती माँ को,
हम सबको है बचाना,
आने वाली पीढ़ियों के लिए,
हरियाली को है सजाना।

जाति-धर्म के नाम पर लड़कर,
कब तक होंगे दूर?
प्रेम, सद्भाव और भाईचारे से,
हर मन हो भरपूर।

सोशल मीडिया की चमक में,
सच को मत खो देना,
सोच-समझकर बात स्वीकारो,
हर बात पर मत रोना।

जागृति की एक किरण ही,
अंधियारा हर सकती है,
एक जागा हुआ इंसान भी,
दुनिया बदल सकता है।

आओ मिलकर शपथ ये लें—
नहीं रहेंगे अनजान,
जागरूक बनेंगे, जागरूक करेंगे,
यही बने हमारी पहचान।

जागो, अब जागो,
समय पुकार रहा है,
तुम्हारे जागने से ही
नया सवेरा आ रहा है।

प्रदूषण का कहर

हवा हुई है ज़हर आज,
धुआँ उगलते कारखाने,
साँसों पर पहरा बैठा है,
कहाँ गए वो दिन सुहाने?

नदियाँ मैली, तालाब सूखे,
कचरे से भरती धार,
धरती माँ की चीख सुनो अब,
बढ़ता जाता अत्याचार।

पेड़ कटे तो छाँव भी रूठी,
पंछी छोड़ गए बसेरा,
कंक्रीट के इस जंगल में,
कहाँ मिलेगा नीला सवेरा?

धुआँ, धूल और शोर ने मिलकर,
जीना किया मुहाल,
प्रकृति से जो खिलवाड़ किया,
भुगत रहा इंसान आज।

बच्चों की साँसें पूछ रही हैं—
किसका है यह दोष?
हमने ही तो जहर घोला है,
हवा, नदी और मिट्टी में रोज।

अब भी वक्त है, चेतो मानव,
मत करना प्रकृति का नाश,
पेड़ लगाओ, जल बचाओ,
स्वच्छ रखो अपना आकाश।

कम करो कचरा, रोक प्रदूषण,
धरती को दो नया जीवन,
आज बचाएँ पर्यावरण को,
कल मुस्काएगा हर जन।

प्रकृति हमारी माँ है प्यारी,
इसका मत अपमान करो,
स्वच्छ हवा और निर्मल जल से,
आने वाला कल खुशहाल करो।

जागो मानव, समय पुकारे,
अब तो अपनी भूल सुधार,
वरना आने वाली पीढ़ियाँ
पूछेंगी—क्यों किया प्रकृति पर वार?

बिल

हर माह आता है बिल—
पानी का,
बिजली का,
अख़बार का,
और भी न जाने किस-किस का…

पर नहीं आता कोई बिल
एक स्त्री के त्याग का,
रसोई में बिताए कई घंटों का,
परिवार को दिए उसके समर्पण का।

सुबह से शाम तक थककर
कितना चूर हुई,
इसका भी कोई बिल नहीं आता।

काश! ऐसा होता—
उसकी मेहनत का भी बिल आता,
उसकी चुप्पी का भी बिल आता,
उसके त्याग की भी कोई कीमत होती,
कुछ वजूद उसका भी होता।

होकर भी वह
परिवार की धुरी,
अदृश्य ही सदैव बनी रहती है।

टूटकर खुद,
फिर भी खड़ी रहती है…
सबको सँभालती है,
और अपने हिस्से का दर्द
चुपचाप सहती रहती है।

सुनीता मीना

सुनिता मीना
उपप्राचार्य और स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन
सवाई माधोपुर महिला प्रकोष्ठ (राज.)

प्रस्तुति

उलझन सुलझन