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अवलोकन

सहारनपुर

शौर्य, शिल्प और अंतरात्मा की धरती

अपनी विश्वविख्यात लकड़ी की नक्काशी और स्वादिष्ट आमों के लिए प्रसिद्ध सहारनपुर ने केवल उत्कृष्ट शिल्प ही नहीं, बल्कि ऐसे वीर योद्धा, कलाकार और न्यायप्रिय व्यक्तित्व भी देश को दिए हैं, जिनकी गाथाएँ सदैव स्मरणीय रहेंगी।

सहारनपुर अपनी पहचान धीमे स्वर में नहीं कराता। उसकी पहचान सुनाई देती है लकड़ी पर चलती छैनी और हथौड़े की लयबद्ध ध्वनि में, जहाँ पीढ़ियों से शिल्पकार अपनी अद्भुत कला को आकार देते आए हैं। यही कारण है कि इसे भारत की वुड कार्विंग कैपिटल कहा जाता है। भारत के लगभग 70 प्रतिशत लकड़ी के हस्तशिल्प उत्पाद यहीं तैयार होते हैं, जो देश ही नहीं, बल्कि दिल्ली से दुबई तक के घरों की शोभा बढ़ाते हैं। दूसरी ओर, दूर-दूर तक फैले आम के बाग़ इस धरती को हर मौसम में हरियाली और सुगंध से भर देते हैं।

किन्तु सहारनपुर केवल अपने शिल्प और बाग़ों तक सीमित नहीं है। इसकी मिट्टी ने सदियों से स्वाभिमान, संघर्ष और प्रतिरोध की अदम्य चेतना को पोषित किया है।

सन 1398 में जब मध्य एशिया का आक्रमणकारी तैमूर भारत आया, तब उसे इस क्षेत्र में अप्रत्याशित प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। स्थानीय परंपराओं के अनुसार महाबली जोगराज सिंह पंवार तथा मात्र बीस वर्षीय रामप्यारी गुर्जरी के नेतृत्व में एक विशाल महापंचायत सेना ने छापामार युद्ध की रणनीति अपनाकर तैमूर की सेना को भारी क्षति पहुँचाई। उनके साहसिक आक्रमणों ने उसकी रसद व्यवस्था को बाधित किया और यह संघर्ष आज भी लोकस्मृतियों में स्वाभिमान और वीरता के अद्वितीय उदाहरण के रूप में जीवित है।

यह विद्रोही चेतना यहीं समाप्त नहीं हुई। वर्ष 1813 में सहारनपुर के गुर्जरों ने वर्तमान उत्तर प्रदेश में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रारम्भिक सशस्त्र विद्रोहों में से एक का नेतृत्व किया। इसके बाद 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी इस क्षेत्र के वीरों ने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध अग्रिम पंक्ति में रहकर संघर्ष किया और कठोर दमन का सामना करते हुए भी अपने साहस से इतिहास में अमिट स्थान बनाया।

सहारनपुर ने केवल वीर ही नहीं, बल्कि संस्कृति और नैतिकता के ऐसे प्रतीक भी दिए जिन्होंने पूरे देश को गौरवान्वित किया।

इसी धरती पर वर्ष 1912 में जन्मी जोहरा सहगल भारतीय रंगमंच, नृत्य और सिनेमा की ऐसी विलक्षण कलाकार थीं, जिन्होंने आठ दशकों से अधिक समय तक अपनी ऊर्जा, सहजता और अभिनय से दर्शकों का मन मोह लिया। उम्र के अंतिम पड़ाव तक उनकी जीवंतता प्रेरणा का स्रोत बनी रही।

इसी प्रकार न्यायमूर्ति सय्यद आगा हैदर ने न्यायपालिका में नैतिक साहस का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। वर्ष 1930 में भगत सिंह प्रकरण की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधिकरण के सदस्य के रूप में उन्होंने मृत्युदंड का समर्थन करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। जब उन पर दबाव डाला गया, तब उन्होंने निर्भीक होकर कहा—

“मैं न्यायाधीश हूँ, कसाई नहीं।”

अपने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय उन्होंने अपना पद त्यागना स्वीकार किया और न्याय, निष्पक्षता तथा अंतरात्मा की आवाज़ को सर्वोच्च स्थान दिया।

सहारनपुर की कार्यशालाओं में गूँजती छैनी की आवाज़ें आज भी उसकी पहचान हैं और उसके आम आज भी उसकी मिठास का प्रतीक हैं। किन्तु इस जनपद की सबसे बड़ी विरासत उसके शिल्प से कहीं अधिक उसके वीरों का साहस, उसके न्यायप्रिय व्यक्तित्वों का चरित्र और उसके कलाकारों की सृजनशीलता है। यही वे अमूल्य धरोहरें हैं, जो सहारनपुर को केवल एक नगर नहीं, बल्कि शौर्य, शिल्प और अंतरात्मा की अमर भूमि बनाती हैं।

सृजक

सचिन राठी, सहारनपुर

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