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आधुनिकता, पारिवारिक संवेदनाएँ और रिश्तों का बदलता परिदृश्य
श्रीमती सीमा पांडे जी का विचारोत्तेजक व्याख्यान

आदरणीय उपस्थित सज्जनो, मातृशक्ति, युवा साथियो एवं प्रियजनो,

आज मैं एक ऐसे विषय पर अपने विचार आपके समक्ष रखना चाहती हूँ, जो हमारे समाज, परिवार और मानवीय संवेदनाओं के केंद्र से जुड़ा हुआ है। बीते कुछ दिनों में देश में घटित कुछ घटनाओं ने हम सबको भीतर तक झकझोर दिया है। विशेष रूप से वे घटनाएँ, जिनमें बेटियों द्वारा माता-पिता के प्रति हिंसात्मक व्यवहार अथवा संवेदनहीनता के समाचार सामने आए—ये केवल समाचार नहीं, बल्कि समाज के अंतर्मन को झकझोर देने वाले प्रश्न हैं।

हम लंबे समय से नारी सशक्तिकरण की बात करते आए हैं। हमने अपनी बेटियों को शिक्षित किया, उन्हें आत्मनिर्भर बनाया, उनके सपनों को उड़ान देने का प्रयास किया—और यह आवश्यक भी था। एक बेटी केवल किसी घर की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की शक्ति, संवेदना और संस्कृति की वाहक होती है। किंतु आज एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—

क्या आधुनिकता और आत्मनिर्भरता की दौड़ में कहीं मानवीय संवेदनाएँ पीछे छूटती जा रही हैं?

विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, दो परिवारों का मिलन माना जाता रहा है। पहले बेटी विवाह के बाद भी मायके और ससुराल के बीच प्रेम, सम्मान और संतुलन का सेतु बनती थी। वह दोनों घरों की गरिमा को अपने व्यवहार से संजोती थी। किंतु बदलते समय में कहीं-कहीं रिश्तों की बुनियाद कमजोर पड़ती दिखाई देती है। आज का समय सुविधाओं का समय है, परंतु क्या यह संवेदनाओं का भी समय रह गया है—यह विचारणीय प्रश्न है।

हम अपनी बेटियों को डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी, उद्यमी बनने की प्रेरणा देते हैं, पर क्या उतनी ही गंभीरता से उन्हें रिश्तों की गरिमा, बड़ों के सम्मान, धैर्य, सहनशीलता और परिवार के भावनात्मक पक्ष की शिक्षा भी दे पा रहे हैं? शिक्षा का उद्देश्य केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि जीवन के नैतिक और मानवीय मूल्यों को समझना भी है।

यह बात केवल बेटियों तक सीमित नहीं है। बेटे भी उतने ही उत्तरदायी हैं। माता-पिता के प्रति सम्मान, परिवार के प्रति संवेदनशीलता और रिश्तों की अहमियत—यह दोनों संतानों के संस्कारों का विषय है। आधुनिकता का अर्थ यह नहीं कि हम अपने मूल्यों से विमुख हो जाएँ। आधुनिक होना और मानवीय बने रहना—दोनों साथ-साथ संभव हैं।

हमें यह समझना होगा कि किसी भी रिश्ते की नींव विश्वास, संवाद और अपनत्व पर टिकी होती है। मतभेद जीवन का हिस्सा हैं, किंतु संवादहीनता और क्रोध रिश्तों को भीतर से खोखला कर देते हैं। किसी भी परिस्थिति में जीवन से बड़ा कुछ नहीं होता। यदि परिवार में विचारों का टकराव है, तो उसका समाधान संवाद, समझ और सहिष्णुता से निकाला जा सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल “सफल” नहीं, बल्कि “संवेदनशील” भी बनाएं। उन्हें यह सिखाएँ कि माता-पिता केवल पालनकर्ता नहीं, बल्कि उनके जीवन की वह नींव हैं, जिन पर उनका संपूर्ण अस्तित्व खड़ा होता है। जिन हाथों ने चलना सिखाया, उन्हें उपेक्षा या पीड़ा देना किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

मैं समाज से, अभिभावकों से, शिक्षकों से और युवाओं से यही आग्रह करना चाहूँगी कि हम आधुनिकता को अपनाएँ, पर अपनी जड़ों को न भूलें। संस्कार और संवेदनाएँ किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी पूँजी होती हैं। यदि इन्हें बचाए रखा गया, तो परिवार भी मजबूत रहेंगे और समाज भी स्वस्थ बनेगा।

अंत में बस इतना कहना चाहूँगी—
रिश्ते अधिकार से नहीं, अपनत्व से चलते हैं।
संस्कारों की रोशनी ही परिवारों को टूटने से बचा सकती है।
आधुनिकता तभी सार्थक है, जब उसमें मानवीय संवेदना जीवित रहे।

धन्यवाद।

सृजक

श्रीमती सीमा पांडे जी

रायपुर (छत्तीसगढ़)