।। मर्द का दर्द।।
आखिर मर्द को भी दर्द होता है,
पर वह दर्द छिपाकर रोता है।
औरत की तरह उसमें भी,
प्रेम, वात्सल्य होता है।
पर वह अपनों की खातिर,
अपने को हर पल खोता है।।
औरत को सदा से ही,
बेचारी कहा जाता है।
पर मर्द तो मौन, बेबसी और,
लाचारी सह जाता है।।
आज तक अबला को,
सबला बनाते आए हैं।
पर मर्द तो अपना,
कर्ज, दर्द, फर्ज निभाते आए हैं।।
रचनाकार
मुकेश कुमावत ‘ मंगल ‘
टोंक (राजस्थान)
प्रस्तुति

