बदलाव
वक़्त बदल रहा है,
लोग बदल रहे हैं,
क्या पता हम भी बदल जाएँ?
क्यों कुछ बदले-बदले से लगते हैं हम,
क्या पता ख़ुद से ही नाराज़ हैं हम?
नाराज़गी इस बात की नहीं
कि हम तुम्हारे नहीं,
नाराज़गी तो ख़ुद से है—
कि हम तुम्हारे क्यों हैं नहीं?
शायद हम वैसे नहीं,
जैसे आप सोच रहे थे।
पर अब कड़वे हैं हम,
क्योंकि वक़्त के साथ बदले हैं हम।
प्रीति एड.

