संकेत साहित्य समिति का कार्यक्रम

संकेत साहित्य समिति का कार्यक्रम

पर्यावरण प्रदूषण पर

संकेत साहित्य समिति की काव्य गोष्ठी

संकेत साहित्य समिति द्वारा वृंदावन हॉल रायपुर में शुक्रवार दिनांक 25 मई को लब्धप्रतिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज के मुख्य आतिथ्य , भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चितरंजन की अध्यक्षता एवं वरिष्ठ बाल साहित्यकार बलदाऊ राम साहू, वरिष्ठ साहित्यकार सुरेन्द्र रावल एवं डॉ. मृणालिका ओझा के विशिष्ट आतिथ्य में पर्यावरण प्रबंधन एवं प्रदूषण नियंत्रण विषय पर केन्द्रित सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के आरंभ में माँ सरस्वती की पूजा अर्चना के पश्चात समिति द्वारा अतिथियों का अंगवस्त्र, मोतियों की माला एवं श्रीफल से सम्मान किया गया।
संकेत साहित्य समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने स्वागत उद्बोधन में पर्यावरण प्रदूषण के कारणों को दर्शाते हुए जीवन में वन के महत्व को रेखांकित किया। डॉ. चितरंजन कर ने कहा कि

“प्रदूषण दरअसल मानव के मानसिक प्रदूषण की ही देन है। जिस दिन मानव सजग एवं सतर्क हो जाएगा प्रदूषण की समस्या सुलझ जाएगी।”

गिरीश पंकज ने कहा कि

“प्रकृति का मानव प्रवृत्ति से गहरा नाता होता है, काव्य गोष्ठियाँ में शामिल होने से नये सृजन को बल मिलता है।”

सुपरिचित कवयित्री पल्लवी झा के सफल संचालन में प्रांत के विभिन्न जिलों से आए जिन कवियों एवं कवयित्रियों ने रोचक काव्य पाठ किया उनमें डॉ. चितरंजन कर, गिरीश पंकज, डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, बलदाऊ राम साहू , सुरेन्द्र रावल, डॉ. मृणालिका ओझा, रामेश्वर शर्मा, संजीव ठाकुर, शशि सुरेन्द्र दुबे, डॉ.रविन्द्र सरकार, बीबीपी मोदी, पल्लवी झा, गणेशदत्त झा, पूर्वा श्रीवास्तव, सुषमा पटेल, हरीश कोटक. राजकुमार सोनी, छबिलाल सोनी, रूपाली चक्रवर्ती, यशवंत यदु, मन्नूलाल यदु, रविश गुप्ता, विवेक राहटगाँवकर, मुरलीधर गोंडाने, गोपाल सोलंकी, अंबर शुक्ला, राजेन्द्र रायपुरी, प्रदीप कुमार मिश्रा, रामचंद्र श्रीवास्तव, एच.एल. चन्द्राकर, दिलीप वरवंडकर, सिद्धार्थ श्रीवास्तव, चेतन भारती, राजेन्द्र ओझा, नीलिमा मिश्रा, कुमार जगदली, राजेश जैन ‘राही’, लतिका भावे, डॉ.सीमा निगम, नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा, डॉ. कमल साहू, डॉ.मंजूला साहू, दिलीप टिकरिहा, माधुरी कर एवं शशांक खरे के नाम प्रमुख हैं।

पर्यावरण प्रबंधन एवं प्रदूषण नियंत्रण विषय पर केन्द्रित नयी चेतना, नयी परिकल्पना एवं नयी विचारधाराओं से संबंधित पढ़ी गईं कुछ रचनाओं के प्रमुख अंश निम्नानुसार हैं-

● रूठे-रूठे क्यों हो मेघा,पूछे हैं डलियाँ।
आकर थोड़ी प्यास बुझाओ, मुरझाईं कलियाँ।।

तपे धरा भी बंजर होकर,रो-रोकर फटती।                            ताल-तलैय्या नदिया सूखे, सबसे वह कटती।                      पनघट प्यासा उपवन छूटा,सूनी हैं गलियाँ।
पल्लवी झा (रूमा)
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● पेड़ लगाओ वन बढ़ाओ समय की है पुकार।                             बिन वन-जंगल के मानव का होगा नहीं उद्धार।।
-डॉ रविंद्रनाथ सरकार
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● सुधा बूँद रसधार बहाओ, भाव सजे विस्तार।                      सृजन सुमन स्वीकार करो माँ, शब्द सजाऊँ हार।।
-सुषमा प्रेम पटेल
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● सरिताओं के पावन जल को निर्मल ही रहने दो। मूक पशुओं को, मासूम पक्षियों को जीने दो।
-डॉ.मंजुला साहू
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● गौरैया दिखती नहीं, नयी सदी के गाँव,
सन्नाटा पसरा हुआ, पानी है ना छाँव।
राजेश जैन ‘राही’
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● हवा की मार जो सहते/वही तरु शेष रहते हैं/अकड़कर जो खड़े रहते/ वही अंधड़ में ढहते हैं। कटा कर पेड़ हम सब ने/किया निर्माण हैं ‌धाँसू/तभी तपती धरा हर दिन/बहाती रक्त के आंँसू।।
-नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा “तृण”
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● कल रात मैंने/देखा एक हसीन सपना/पर्यावरण का हरा हरा/आँचल ओढ़े/धरती मुस्कुरा रही है/ दूर बहुत दूर/ हिमालय की शुभ्र चोटियाँ/ सूर्य किरणों में/ स्वर्ण सी चमचमा रही हैं।
– नीलिमा मिश्रा
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● हँसेगी धरती माता, साफ रहेगा वायुमंडल।                          शुद्ध रहेगा, करे रक्षा जंगल पेड़ पौधों की।
-बीबीपी मोदी
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● नदी वस्तु नहींं जीवन है/नदी का सूखना सिर्फ दो किनारों के बीच बहते पानी रुकना नहीं है/न जाने कितने विश्वासों का टूटना है/जाने कितने जीवों का प्यासे तड़पना है।                                    -दिलीप वरवंडकर
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● जी चाहता है आज सब कुछ बोल दूं
पर्यावरण में सरंक्षण का सच घोल दूं। हुई साजिश क्या पीसीबी- कारखानेदार में विधायक तेरी बता दूं या मंत्री का खोल दूं।
-कुमार जगदली ‘सुनील ‘
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● सुबह से निहारता वृक्ष/कब होगी बरसात/इन्हीं आशाओं के साथ
पत्ते सूखने के कगार पर/डालियों से पत्तों का साथ छूटने का भय/ कैसे होगा निवारण
रामेश्वर शर्मा
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● प्रकृति का दोहन बढ़ गया है, न जाने कैसा ये चलन हो गया है।
प्रगति की राह पर तो चल पड़े हैं, पर पर्यावरण का विनाश कर रहे हैं।
-राजकुमार सोनी
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● पर्यावरण प्रदूषण की चर्चा चहुँ ओर है।
पर्यावरण संरक्षण की चिंता चहुँ ओर है।
एक पेड़ मां के नाम अभियान चलाना है!
पर्यावरण बचाकर भावी पीढ़ी को बचाना है!
-डॉ सीमा निगम
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● पौधारोपण करते रहिए, आप सहित परिवार।                     बढ़कर ये ही कर पाएंगे, धरती का शृंगार।
– राजेंद्र रायपुरी।।
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● कइसे करँव मैं जतन धरती के,
कइसे करँव मैं जतन।
जंगल कटावथे, भुइंँया सुखावथे,
आगी उगलत हे पवन ……
-दिलीप टिकरिहा “छत्तीसगढ़िया”
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● जरा प्रकृति हो जाएं/नैतिकता की तलाश करें/किसी माहग्रंथ में नहीं/ धरती की हथेलियों पर/लिखी शब्द की सम्वेदनाओं में/जहाँ वृक्ष बिना पूछे छाँह दे देता/जहाँ नदियां थककर/भी प्यास नहीं टालती।
-संजीव ठाकुर
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● ये प्रदूषण की है इंतिहाँ हम धरा को बचाएँ चलो। हर तरफ है धुआँ ही धुआँ हम धरा को बचाएँ चलो। जीने लायक न पर्यावरण, बोलो हम किसकी जाएँ शरण,
सांस लेना भी दूभर हुआ हम धरा को बचाएँ चलो।
-रामचन्द्र श्रीवास्तव
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● ताल तलैया पाट दिए सब/अब पानी बाटल के पी रहे/जंगल झाड़ी सब काट दिए/ए सी कूलर में हैं जी रहे/बरगद भी बौने हो गये/जस हो वामन अवतार/गमले में कैद वो हो गए, तज, दिए वो मूल आकार
-छबि लाल सोनी
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● यहां एक दरवाजा था/जहां से रौशनी आती थी/हवा और धूप भी/यहां एक खिड़की थी/जहां से हवा आती थी/और रौशनी भी भरपूर/ गिरती हुई मिसाइलों और/उड़ते हुए ड्रोनों से/न दरवाजा बचा/न खिड़की/कहां और कैसे बचता/बेचारा रोशनदान
-राजेंद्र ओझा
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● यह दुनिया बदरंग हो जाएगी गर हम अब भी न जागेंगे
चांद भी सूरज बन जाएगा गर हम मनमानी न छोड़ेंगे
विवेक कुमार रहाटगांवकर
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● अब नदिया दूध से नहीं दूध की पन्नियों से आच्छादित है
सरिता का प्रदूषित जल
पीने के लिए बाधित है।
-एच एल. चन्द्राकर
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● अगर न होंगे पेड़ जहां में, कहां पर होगी सुख की ठौर,
ढूंढ़ेंगी तितलियां फूलों को, बादल ढूंढ़ेंगे पागल मोर।
-डॉ. मृणालिका ओझा
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● देश के प्रहरी बनेंगे, लाल बस्तर के। और सचमुच देखना तुम,एक दिन जब इसी बस्तर की यही माटी कभी इस देश का गौरव बनेगी।
-सुरेंद्र रावल
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● एक परिंदा उड़कर आया मेरी छत पर।
गीत मनोहर उसने गाया मेरी छत पर।
वन-उपवन को हमने काटा बर्बर होकर,
उसने अपना नीड़ बनाया मेरी छत पर।
– बलदाऊ राम साहू
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● पेड़ों से जीवन है , तुम उसे न काटना ।
बाँट सको तो घर-घर हरियाली बाँटना।।
-डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
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● बौने पौधे सजा रहे हैं अपना आँगन।
मानो सिमट गया है आसमान जैसा मन ।।
-डॉ. चितरंजन कर
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● अगर पेड़ कट जाएंगे तो क्या हम सब बच पाएंगे.
बस विकास के नाम पर केवल, झुलस झुलस मर जाएंगे.
-गिरीश पंकज
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कार्यक्रम के अंत में कार्यक्रम संयोजक गणेश दत्त झा ने आमंत्रित अतिथियों एवं रचनाकारों के प्रति संकेत साहित्य समिति की ओर से आभार व्यक्त किया।
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झलकियाँ

सूचना स्रोत

सीमा पाण्डेय

स्थानीय सम्पादिका

उलझन सुलझन महिला प्रकोष्ठ

रायपुर (छत्तीसगढ़)

प्रस्तुति